संक्षिप्त उत्तर

ईश्वर (﷾) को हमारी उपासना की ज़रूरत नहीं, और उसे इससे कुछ नहीं मिलता। जो रचयिता किसी पर निर्भर नहीं, उसे न प्रशंसा बड़ा बना सकती है न उपेक्षा छोटा। क़ुरआन कहता है कि लोग ही ईश्वर (﷾) के मुहताज हैं, जबकि वह हर ज़रूरत से बेनियाज़ है। पैगंबर (ﷺ) ने ईश्वर (﷾) की ओर से जो कथन बताया, उसमें सब लोगों की परहेज़गारी मिलकर भी उसकी बादशाही में कुछ नहीं बढ़ाती। इसलिए उपासना उसका हक़ है, जो केवल उसी को दी जाती है, और उसका सारा लाभ हमारा है। जो सचमुच प्रशंसा के योग्य है उसकी प्रशंसा करना उसे सही देखना है, चापलूसी नहीं। जिसने हमें सब कुछ दिया उसका धन्यवाद करना हमें कृतज्ञ लोग बनाता है। और हर कोई अपनी सबसे गहरी निष्ठा किसी न किसी चीज़ को देता है। हमें बनाने वाले की सेवा व्यक्ति को अनेक मालिकों से आज़ाद करती है। फिर ईमान, नमाज़ और अच्छा चरित्र जीवन का एक ही मार्ग बन जाते हैं।

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