संक्षिप्त उत्तर

ईश्वर (﷾) को जानना और उसकी इबादत करना। क़ुरआन कहता है कि ईश्वर (﷾) ने जिन्नों (अदृश्य प्राणियों) और मनुष्यों को केवल अपनी इबादत के लिए पैदा किया। हर व्यक्ति उसकी एक जन्मजात जागरूकता के साथ पैदा होता है। क़ुरआन कहता है कि आदम की सारी संतान ने एक बार गवाही दी थी कि ईश्वर (﷾) उनका पालनहार है। पैगंबर मुहम्मद (ﷺ) ने कहा कि हर बच्चा फ़ितरत पर, यानी ईश्वर (﷾) को जानने की स्वाभाविक अवस्था पर, पैदा होता है। ईश्वर (﷾) को हमारी इबादत की ज़रूरत नहीं। उसे किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं, और हमें उसकी ज़रूरत है। इस्लाम में इबादत नमाज़ से बढ़कर है। इसका अर्थ है पूरे जीवन में ईश्वर (﷾) की आज्ञा मानना और उसे अधिक से अधिक याद करना। ईसा ने भी यही सिखाया: केवल वही स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करेंगे जो उनके पिता की इच्छा पर चलते हैं। क़ुरआन कहता है कि जो ईमान लाए और भले काम किए, वही सबसे अच्छे प्राणी हैं।

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