संक्षिप्त उत्तर
क़ुरआन इस प्रश्न का जवाब ख़ुद, ठीक अगली आयत में, देता है। वह कहता है कि ईश्वर (﷾) ने जहन्नम पर फ़रिश्तों की संख्या एक परीक्षा के रूप में तय की। वही आयत बताती है कि क्यों। यहूदी और ईसाई, यानी अहले किताब, यक़ीन पाएँगे। ईमान वाले ईमान में बढ़ेंगे। संदेह करने वाले पूछेंगे कि इस संख्या से ईश्वर (﷾) का क्या मतलब है। तो जो प्रश्न आज कोई आलोचक पूछता है, उसका नाम और जवाब पहले से इस अंश में है। आयत यह भी कहती है कि ईश्वर (﷾) की सेनाओं को उसके सिवा कोई नहीं जानता। उन्नीस रखवालों की संख्या है, उसकी शक्ति की सीमा नहीं। यह कोई विरोधाभास या ग़लती नहीं। इस्लाम का जवाब है कि यह एक परीक्षा है, और आयत यही कहती है।
पूरी व्याख्या
अंश किस बारे में है
संख्या से पहले की आयतें आग का वर्णन करती हैं। वह न कुछ बाक़ी रखती है न कुछ छोड़ती है, और खाल को झुलस देती है। उसके रखवालों की संख्या उसी चेतावनी का हिस्सा है। अंश इस सबको मनुष्य के लिए उपदेश कहकर ख़त्म होता है।
“और आपको किस चीज़ ने अवगत कराया कि 'सक़र' (जहन्नम) क्या है? वह न शेष रखेगी और न छोड़ेगी। वह खाल को झुलस देने वाली है।”
“उसपर उन्नीस (फ़रिश्ते) नियुक्त हैं। और हमने जहन्नम के रक्षक फ़रिश्ते ही बनाए हैं और उनकी संख्या को काफ़िरों के लिए परीक्षण बनाया है। ताकि अह्ले किताब विश्वास कर लें और ईमान वाले ईमान में आगे बढ़ जाएँ। और किताब वाले एवं ईमान वाले किसी संदेह में न पड़ें। और ताकि वे लोग जिनके दिलों में रोग है और वे लोग जो काफ़िर हैं, यह कहें कि इस उदाहरण से अल्लाह का क्या तात्पर्य है? ऐसे ही, अल्लाह जिसे चाहता है गुमराह करता है और जिसे चाहता है सीधा मार्ग दिखाता है। और आपके पालनहार की सेनाओं को उसके सिवा कोई नहीं जानता। और यह तो केवल मनुष्य के लिए उपदेश है।”
संख्या और उसका बताया गया कारण
आलोचक कहते हैं कि उन्नीस की संख्या मनमानी है, या जहन्नम के फ़रिश्तों के बारे में दूसरी रिवायतों से टकराती है। आयत 30 संख्या देती है। आयत 31 तुरंत आती है और उसे समझाती है। रखवाले फ़रिश्ते हैं। संख्या ईमान को ठुकराने वालों के लिए परीक्षा के रूप में तय की गई। उम्मीद थी कि संदेह करने वाले पूछेंगे कि ईश्वर (﷾) का इससे क्या मतलब है। क़ुरआन की कोई और आयत आग के रखवालों की कोई अलग संख्या नहीं देती। आयत संख्या को परीक्षा कहती है। वह किसी छिपे हुए कोड की कोई बात नहीं करती।
“उसपर उन्नीस (फ़रिश्ते) नियुक्त हैं। और हमने जहन्नम के रक्षक फ़रिश्ते ही बनाए हैं और उनकी संख्या को काफ़िरों के लिए परीक्षण बनाया है। ताकि अह्ले किताब विश्वास कर लें और ईमान वाले ईमान में आगे बढ़ जाएँ। और किताब वाले एवं ईमान वाले किसी संदेह में न पड़ें। और ताकि वे लोग जिनके दिलों में रोग है और वे लोग जो काफ़िर हैं, यह कहें कि इस उदाहरण से अल्लाह का क्या तात्पर्य है? ऐसे ही, अल्लाह जिसे चाहता है गुमराह करता है और जिसे चाहता है सीधा मार्ग दिखाता है। और आपके पालनहार की सेनाओं को उसके सिवा कोई नहीं जानता। और यह तो केवल मनुष्य के लिए उपदेश है।”
व्याख्याकारों ने इसे कैसे पढ़ा
तफ़सीर विद्वानों द्वारा क़ुरआन की व्याख्या है। तफ़सीर के विद्वान इब्न कसीर, जिनकी मृत्यु 1373 में हुई, बताते हैं कि क़ुरैश के सरदारों ने जब पहली बार यह संख्या सुनी तो उसका मज़ाक़ उड़ाया। क़ुरैश वह क़बीला था जो मक्का पर शासन करता था। वे कहते हैं कि उन्होंने सोचा कि उनके मुट्ठी भर आदमी उन्नीस पर भारी पड़ सकते हैं। वे कहते हैं कि अगली आयत ने उन्हें जवाब दिया: रखवाले फ़रिश्ते हैं, और उनकी संख्या एक परीक्षा है। वे समझाते हैं कि अहले किताब को यक़ीन पाना था। वे कहते हैं कि ऐसा इसलिए था कि रसूल (ﷺ) ने उन उतरी हुई किताबों के अनुरूप बात कही जो उनके पास पहले से थीं। वे आयत के अंत का अर्थ यह लेते हैं कि केवल ईश्वर (﷾) जानता है कि उसके कितने फ़रिश्ते हैं।
इब्न कसीर समझाते हैं कि जहन्नम के रखवालों की संख्या एक परीक्षा के रूप में बताई गई। क़ुरैश के काफ़िरों ने इसका मज़ाक़ उड़ाया और सोचा कि उनके मुट्ठी भर आदमी उन्नीस पर भारी पड़ सकते हैं। अहले किताब को यक़ीन दिलाना था, क्योंकि रसूल ने उन उतरी हुई किताबों के अनुरूप बात कही जो उनके पास पहले से थीं, और ईमान वालों का ईमान बढ़ना था। वे “तुम्हारे रब की सेनाओं को उसके सिवा कोई नहीं जानता” का अर्थ यह लेते हैं कि ईश्वर के फ़रिश्तों की संख्या और बहुलता ईश्वर के सिवा कोई नहीं जानता।
उन्नीस रखवाले और जहन्नम को लाने वाले फ़रिश्ते
एक सहीह हदीस, यानी पैगंबर (ﷺ) के कथन की एक रिपोर्ट, दूसरे फ़रिश्तों की बात करती है। वह कहती है कि क़यामत के दिन जहन्नम को सत्तर हज़ार लगामों के साथ लाया जाएगा, हर लगाम को सत्तर हज़ार फ़रिश्ते खींच रहे होंगे। पैगंबर (ﷺ) एक अलग काम वाले एक अलग समूह का वर्णन कर रहे थे। उन्नीस आग पर नियुक्त रखवाले हैं। ये दूसरे फ़रिश्ते उस दिन जहन्नम को आगे लाते हैं। आयत 31 ख़ुद कहती है कि ईश्वर (﷾) की सेनाओं को उसके सिवा कोई नहीं जानता। इसलिए उन्नीस रखवाले कभी उसके फ़रिश्तों की पूरी संख्या नहीं थे।
अब्दुल्लाह बिन मसऊद बताते हैं कि पैगंबर (ﷺ) ने कहा कि क़यामत के दिन जहन्नम को सत्तर हज़ार लगामों के साथ लाया जाएगा, हर लगाम को सत्तर हज़ार फ़रिश्ते खींच रहे होंगे।
“उसपर उन्नीस (फ़रिश्ते) नियुक्त हैं। और हमने जहन्नम के रक्षक फ़रिश्ते ही बनाए हैं और उनकी संख्या को काफ़िरों के लिए परीक्षण बनाया है। ताकि अह्ले किताब विश्वास कर लें और ईमान वाले ईमान में आगे बढ़ जाएँ। और किताब वाले एवं ईमान वाले किसी संदेह में न पड़ें। और ताकि वे लोग जिनके दिलों में रोग है और वे लोग जो काफ़िर हैं, यह कहें कि इस उदाहरण से अल्लाह का क्या तात्पर्य है? ऐसे ही, अल्लाह जिसे चाहता है गुमराह करता है और जिसे चाहता है सीधा मार्ग दिखाता है। और आपके पालनहार की सेनाओं को उसके सिवा कोई नहीं जानता। और यह तो केवल मनुष्य के लिए उपदेश है।”
वह परीक्षा जो क़ुरआन अपने लिए रखता है
क़ुरआन अपने पाठकों से उस पर ध्यान से विचार करने को कहता है। वह कहता है कि अगर वह ईश्वर (﷾) के सिवा किसी और की ओर से होता, तो वे उसमें बहुत-सी असंगति पाते। उन्नीस की संख्या पर आपत्ति कोई विरोधाभास नहीं है। यह इस बारे में एक प्रश्न है कि ईश्वर (﷾) ने एक संख्या क्यों चुनी। अंश ख़ुद उस प्रश्न का नाम लेता है और उसका जवाब देता है। वह संख्या देता है और बताता है कि वह क्यों दी गई। वह कहता है कि संदेह करने वाले पूछेंगे कि ईश्वर (﷾) का इससे क्या मतलब है। जो प्रश्न आज कोई आलोचक उठाता है, वह वही है जिसका नाम और जवाब अंश पहले ही दे चुका है।
“तो क्या वे क़ुरआन पर चिंतन मनन नहीं करते? यदि वह अल्लाह के सिवा किसी और की ओर से होता, तो वे उसमें बहुत-सा अंतर्विरोध (असंगति) पाते।”
“उसपर उन्नीस (फ़रिश्ते) नियुक्त हैं। और हमने जहन्नम के रक्षक फ़रिश्ते ही बनाए हैं और उनकी संख्या को काफ़िरों के लिए परीक्षण बनाया है। ताकि अह्ले किताब विश्वास कर लें और ईमान वाले ईमान में आगे बढ़ जाएँ। और किताब वाले एवं ईमान वाले किसी संदेह में न पड़ें। और ताकि वे लोग जिनके दिलों में रोग है और वे लोग जो काफ़िर हैं, यह कहें कि इस उदाहरण से अल्लाह का क्या तात्पर्य है? ऐसे ही, अल्लाह जिसे चाहता है गुमराह करता है और जिसे चाहता है सीधा मार्ग दिखाता है। और आपके पालनहार की सेनाओं को उसके सिवा कोई नहीं जानता। और यह तो केवल मनुष्य के लिए उपदेश है।”
आपत्तियों के उत्तर
क़ुरआन 74:30-31 — सूरह अल-मुद्दस्सिर, आयतें 30-31
“उसपर उन्नीस (फ़रिश्ते) नियुक्त हैं। और हमने जहन्नम के रक्षक फ़रिश्ते ही बनाए हैं और उनकी संख्या को काफ़िरों के लिए परीक्षण बनाया है। ताकि अह्ले किताब विश्वास कर लें और ईमान वाले ईमान में आगे बढ़ जाएँ। और किताब वाले एवं ईमान वाले किसी संदेह में न पड़ें। और ताकि वे लोग जिनके दिलों में रोग है और वे लोग जो काफ़िर हैं, यह कहें कि इस उदाहरण से अल्लाह का क्या तात्पर्य है? ऐसे ही, अल्लाह जिसे चाहता है गुमराह करता है और जिसे चाहता है सीधा मार्ग दिखाता है। और आपके पालनहार की सेनाओं को उसके सिवा कोई नहीं जानता। और यह तो केवल मनुष्य के लिए उपदेश है।”
किस बात के लिए उद्धृत
आलोचक कहते हैं कि उन्नीस की संख्या मनमानी है।
जवाब
अंश संख्या को बिना समझाए नहीं छोड़ता। आयत 31 कहती है कि यह परीक्षा के रूप में तय की गई। इब्न कसीर बताते हैं कि क़ुरैश ने इसका मज़ाक़ उड़ाया, यह सोचकर कि उनके कुछ आदमी उन्नीस पर भारी पड़ सकते हैं। संख्या ने परखा कि क्या वे चेतावनी को गंभीरता से लेंगे। ख़ुद फ़रिश्तों की तरह, यह ग़ैब से संबंधित है, जो वह्य से जाना जाता है।
निष्कर्ष — संख्या एक परीक्षा है, और अंश ख़ुद यही कहता है।
सहीह मुस्लिम 2842 — किताब अल-जन्नह व सिफ़ति नईमिहा व अहलिहा (जन्नत, उसके वर्णन और उसके लोगों की किताब), हदीस 2842
अब्दुल्लाह बिन मसऊद बताते हैं कि पैगंबर (ﷺ) ने कहा कि क़यामत के दिन जहन्नम को सत्तर हज़ार लगामों के साथ लाया जाएगा, हर लगाम को सत्तर हज़ार फ़रिश्ते खींच रहे होंगे।
किस बात के लिए उद्धृत
आलोचक कहते हैं कि उन्नीस जहन्नम के फ़रिश्तों के बारे में दूसरी रिवायतों से टकराता है। वे उस हदीस की ओर इशारा करते हैं जिसमें जहन्नम को सत्तर हज़ार लगामों से आगे लाया जाता है, हर लगाम को सत्तर हज़ार फ़रिश्ते खींचते हैं।
जवाब
उन फ़रिश्तों का काम अलग है। उन्नीस आग पर नियुक्त रखवाले हैं, जबकि दूसरे क़यामत के दिन जहन्नम को आगे लाते हैं। आयत 31 यह भी कहती है कि ईश्वर (﷾) की सेनाओं को उसके सिवा कोई नहीं जानता।
निष्कर्ष — उन्नीस रखवाले कभी ईश्वर (﷾) के फ़रिश्तों की पूरी संख्या नहीं थे, इसलिए रिवायतें टकराती नहीं।
दृष्टिकोण
इस्लामी दृष्टिकोण
जहन्नम के उन्नीस रखवाले फ़रिश्ते हैं, और उनकी संख्या एक परीक्षा के रूप में उतारी गई। अंश आपत्ति का नाम लेता है और उसका जवाब देता है, इसलिए यह कोई नई खोज नहीं है। जब पैगंबर (ﷺ) के समय में क़ुरैश के सरदारों ने संख्या का मज़ाक़ उड़ाया, तो उसके बाद की आयत ने उन्हें जवाब दिया।
संख्या के ठीक बाद की आयत कहती है कि संख्या परीक्षा के रूप में तय की गई। वह कहती है कि इनकार करने वाले पूछेंगे कि ईश्वर (﷾) का इससे क्या मतलब है।
वही आयत कहती है कि ईश्वर (﷾) की सेनाओं को केवल ईश्वर (﷾) जानता है। इसलिए उन्नीस रखवालों की संख्या है, उसकी शक्ति की सीमा नहीं।
जहन्नम को आगे लाने वाले फ़रिश्तों की हदीस आग के उन्नीस रखवालों से एक अलग समूह का वर्णन करती है। इसलिए दोनों टकराते नहीं।
टीकाकार बताते हैं कि क़ुरैश के सरदारों ने संख्या का मज़ाक़ उड़ाया, और उसके बाद की आयत ने उन्हें जवाब दिया।
ईश्वर (﷾) ने कोई संख्या क्यों चुनी, यह प्रश्न विरोधाभास नहीं है। इसलिए यह वह असंगति नहीं जिसकी परीक्षा क़ुरआन 4:82 रखता है।
आग की रक्षा करने वाले फ़रिश्ते, और उनकी संख्या, ग़ैब से संबंधित हैं। मुसलमान ग़ैब को वह्य के कहने पर मानते हैं।