संक्षिप्त उत्तर

क़ुरआन इस प्रश्न का जवाब ख़ुद, ठीक अगली आयत में, देता है। वह कहता है कि ईश्वर (﷾) ने जहन्नम पर फ़रिश्तों की संख्या एक परीक्षा के रूप में तय की। वही आयत बताती है कि क्यों। यहूदी और ईसाई, यानी अहले किताब, यक़ीन पाएँगे। ईमान वाले ईमान में बढ़ेंगे। संदेह करने वाले पूछेंगे कि इस संख्या से ईश्वर (﷾) का क्या मतलब है। तो जो प्रश्न आज कोई आलोचक पूछता है, उसका नाम और जवाब पहले से इस अंश में है। आयत यह भी कहती है कि ईश्वर (﷾) की सेनाओं को उसके सिवा कोई नहीं जानता। उन्नीस रखवालों की संख्या है, उसकी शक्ति की सीमा नहीं। यह कोई विरोधाभास या ग़लती नहीं। इस्लाम का जवाब है कि यह एक परीक्षा है, और आयत यही कहती है।

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