संक्षिप्त उत्तर
नहीं। क़ुरआन उस पर संदेह करने वाले हर व्यक्ति को चुनौती देता है कि उस जैसी एक ही सूरह ले आओ। वह कहता है कि सारे मनुष्य और जिन्न (अदृश्य प्राणी) मिलकर भी ऐसा नहीं कर सकते। चुनौती पहले मक्का के अरबों के सामने रखी गई, एक ऐसी क़ौम जिसकी सबसे बड़ी कला कविता थी। मक्का के प्रमुख क़बीले क़ुरैश चाहते थे कि पैगंबर (ﷺ) को चुप करा दिया जाए। उन्होंने उनके क़बीले का बहिष्कार किया, उनके अनुयायियों को यातनाएँ दीं और युद्ध किया, पर कभी एक सूरह नहीं बनाई। उनके सबसे अच्छे आलोचक, वलीद बिन मुग़ीरा, ने कहा कि यह न कविता है न काहिनों (भविष्य बताने वालों) की बात। आख़िर में वह इसे केवल जादू कह सका, एक ऐसा फ़ैसला जिसे क़ुरआन दर्ज करता है। मुसैलिमा जैसे नुबुव्वत के झूठे दावेदार उठे, और अरबी जानने वालों के बीच कोई नक़ल स्थायी स्वीकृति नहीं पा सकी। इस्लाम सिखाता है कि यह इस बात की निशानी है कि क़ुरआन ईश्वर (﷾) की ओर से है।
पूरी व्याख्या
क़ुरआन के अपने शब्दों में चुनौती
क़ुरआन ख़ुद शर्तें तय करता है। वह उनसे, जो कहते हैं कि यह गढ़ा गया है, कहता है कि इस जैसी एक बात ले आओ, इस जैसी दस सूरतें, या इस जैसी एक ही सूरह। वे ईश्वर (﷾) के सिवा जिस किसी मददगार को पा सकें, बुला सकते हैं। वह कहता है कि मनुष्य और जिन्न मिलकर भी इस जैसा नहीं ला सकेंगे, चाहे एक-दूसरे के सहायक ही क्यों न हो जाएँ।
“और यदि तुम उस (पुस्तक) के बारे में किसी संदेह में हो, जो हमने अपने बंदे पर उतारा है, तो उसके समान एक सूरत ले आओ और अल्लाह के सिवा अपने समर्थकों को भी बुला लो, यदि तुम सच्चे हो।”
“क्या वे कहते हैं कि उसने इस (क़ुरआन) को स्वयं गढ़ लिया है? आप कह दें : तो तुम इस जैसी एक सूरत ले आओ और अल्लाह के सिवा जिसे बुला सको बुला लो, यदि तुम सच्चे हो।”
“बल्कि क्या वे कहते हैं कि उसने इस (क़ुरआन) को स्वयं गढ़ लिया है? आप कह दें कि इस जैसी गढ़ी हुई दस सूरतें ले आओ और अल्लाह के सिवा, जिसे बुला सकते हो, बुला लो, यदि तुम सच्चे हो।”
“या वे कहते हैं कि उसने इसे स्वयं गढ़ लिया है? बल्कि वे ईमान नहीं लाते। तो फिर वे इस (क़ुरआन) के समान एक ही बात बनाकर ले आएँ, यदि वे सच्चे हैं।”
“आप कह दें : यदि समस्त मनुष्य तथा जिन्न इस बात पर एकत्रित हो जाएँ कि इस क़ुरआन के समान (कोई पुस्तक) ले आएँ, तो इस जैसी पुस्तक नहीं ला सकेंगे, चाहे वे एक-दूसरे के सहायक ही क्यों न हो जाएँ!”
इस जैसा एक कलाम
जो कहते हैं कि इसे गढ़ लिया गया, वे इस जैसा एक कलाम ले आएँ।
इस जैसी दस सूरतें
इस जैसी दस गढ़ी हुई सूरतें ले आओ, और ईश्वर (﷾) के सिवा जिस मददगार को चाहो बुला लो।
इस जैसी एक सूरह
इस जैसी एक ही सूरह ले आओ।
कोई कभी न ला सका
इंसान और जिन्न मिलकर भी, एक-दूसरे की मदद करके भी, इस जैसा नहीं ला सकते।
चुनौती का फ़ैसला कौन करता है?
सीधी आपत्ति यह है कि कोई भी अरबी का एक पन्ना लिखकर जीत का दावा कर सकता है, और मुसलमान कभी हार नहीं मानेंगे। जवाब यह है कि पहले फ़ैसला करने वाले मुसलमान नहीं थे। चुनौती अरबी में क़ुरैश और उनके आसपास के अरबों के सामने रखी गई। उनकी सबसे बड़ी कला कविता थी, और वे पैगंबर (ﷺ) को ख़त्म करना चाहते थे। उन्होंने तो यह भी कहा कि अगर वे चाहें तो ऐसे शब्द कह सकते हैं। काबा (मक्का का पवित्र घर) पर पढ़ी गई एक भी विश्वसनीय सूरह उनका दावा ख़त्म कर देती। उनकी अपनी किताब कहती थी कि वे ऐसा नहीं कर सकते। उन्होंने कभी ऐसा नहीं किया।
“क्या वे कहते हैं कि उसने इस (क़ुरआन) को स्वयं गढ़ लिया है? आप कह दें : तो तुम इस जैसी एक सूरत ले आओ और अल्लाह के सिवा जिसे बुला सको बुला लो, यदि तुम सच्चे हो।”
“बल्कि क्या वे कहते हैं कि उसने इस (क़ुरआन) को स्वयं गढ़ लिया है? आप कह दें कि इस जैसी गढ़ी हुई दस सूरतें ले आओ और अल्लाह के सिवा, जिसे बुला सकते हो, बुला लो, यदि तुम सच्चे हो।”
“या वे कहते हैं कि उसने इसे स्वयं गढ़ लिया है? बल्कि वे ईमान नहीं लाते। तो फिर वे इस (क़ुरआन) के समान एक ही बात बनाकर ले आएँ, यदि वे सच्चे हैं।”
“आप कह दें : यदि समस्त मनुष्य तथा जिन्न इस बात पर एकत्रित हो जाएँ कि इस क़ुरआन के समान (कोई पुस्तक) ले आएँ, तो इस जैसी पुस्तक नहीं ला सकेंगे, चाहे वे एक-दूसरे के सहायक ही क्यों न हो जाएँ!”
“और जब उनके सामने हमारी आयतें पढ़ी जाती है, तो वे कहते हैं : निःसंदेह हमने सुन लिया। यदि हम चाहें, तो निश्चय इस (क़ुरआन) जैसा हम भी कह दें। यह तो पहले लोगों की काल्पनिक कहानियों के सिवा कुछ नहीं।”
क़ुरैश ने इसके बजाय क्या चुना
एक सूरह लिखने के बजाय क़ुरैश ने पैगंबर (ﷺ) के क़बीले का दो या तीन साल तक बहिष्कार किया। उन्होंने उनके अनुयायियों को यातनाएँ दीं, उन्हें निकाल दिया और फिर उनसे युद्ध किया। पैगंबर (ﷺ) के एक ग़ुलाम अनुयायी बिलाल को तपती ज़मीन पर छाती पर पत्थर रखकर लिटाया गया। उन्होंने अपने लोगों से यह भी कहा कि क़ुरआन न सुनो और उसमें शोर करो, ताकि वे प्रभावशाली रहें। क़ुरआन ख़ुद यह बताता है। किसी कवि को लोगों को अपने प्रतिद्वंद्वी की कविता सुनने से रोकने की ज़रूरत नहीं पड़ती।
बताते हैं कि क़ुरैश ने मक्का में पैगंबर (ﷺ) के अनुयायियों को कैसे सताया, जिसमें यह भी है कि उमय्या बिन ख़लफ़ ने बिलाल को दोपहर की गर्मी में पीठ के बल लिटाकर उनकी छाती पर एक बड़ा पत्थर रख दिया; और कि क़ुरैश ने हाशिम और मुत्तलिब के क़बीलों के बहिष्कार का एक समझौता लिखा, जो दो या तीन साल चला।
“तथा काफ़िरों ने कहा कि इस क़ुरआन को न सुनो और (जब पढ़ा जाए तो) इसमें शोर करो। ताकि तुम प्रभावशाली रहो।”
उनके सबसे अच्छे आलोचक का फ़ैसला
क़ुरैश ने अपने सबसे अच्छे भाषा-पारखी वलीद बिन मुग़ीरा से ऐसा फ़ैसला माँगा जिसे वे पैगंबर (ﷺ) के विरुद्ध इस्तेमाल कर सकें। उसने काहिनों की बात, पागलपन और कविता को ख़ारिज कर दिया, और कहा कि उसकी वाणी मीठी और फलदार है। सबसे अच्छा आरोप जो वह दे सका, वह जादू का था। पैगंबर (ﷺ) के एक आरंभिक जीवनीकार इब्न इसहाक़ बताते हैं कि उस फ़ैसले को दर्ज करने वाला अंश वलीद के बारे में उतरा। इस रिवायत के अनुसार, यह मक्का में तब पढ़ा गया जब वह इससे इनकार करने के लिए ज़िंदा था।
बताते हैं कि जब हज का मौसम क़रीब आया, तो क़ुरैश वलीद बिन मुग़ीरा से मिले ताकि तय करें कि आनेवाले अरबों को पैगंबर (ﷺ) के बारे में क्या बताएँ। वलीद ने हर सुझाव ठुकरा दिया: क़ुरआन किसी ज्योतिषी की बुदबुदाहट नहीं था, न किसी पागल की बात, और न कविता, क्योंकि वह हर तरह की कविता जानता था; और न ही जादू था। उसने कहा कि उसकी वाणी मीठी है, खजूर के उस पेड़ की तरह जिसकी डालियाँ फल देती हैं। अंत में उसने कहा कि सबसे क़रीबी आरोप यह होगा कि वह एक जादूगर है जिसकी बातें आदमी को उसके परिवार से अलग कर देती हैं। इब्न इसहाक़ बताते हैं कि क़ुरआन 74:11-25 वलीद के बारे में उतरीं।
“फिर उसने कहा : यह तो मात्र एक जादू है, जो (पहलों से) नक़ल (उद्धृत) किया जाता है। यह तो मात्र मनुष्य की वाणी है।”
न कविता, न काहिनों की बात
‘उस जैसी’ सूरह के लिए अच्छी अरबी से ज़्यादा चाहिए, जो आम है। अरबों में ऊँची वाणी के दो सबसे प्रसिद्ध रूप कविता (शेर) और काहिनों (भविष्य बताने वालों) की तुकबंद बातें थीं। कविता के तय छंद थे जिनके उनके पास नाम थे। क़ुरआन कहता है कि वह किसी कवि की वाणी नहीं, न किसी काहिन की। वलीद, जो हर तरह की कविता जानता था, सहमत था कि वह दोनों में से कुछ नहीं है। वह ईश्वर (﷾) की वाणी होने का भी दावा करता है, जो तेईस वर्षों में एक ऐसे व्यक्ति के ज़रिए दी गई जो पढ़ते-लिखते नहीं थे।
“और यह किसी कवि की वाणी नहीं है। तुम बहुत कम ईमान लाते हो। और न किसी काहिन की वाणी है, तुम बहुत कम शिक्षा ग्रहण करते हो।”
बताते हैं कि जब हज का मौसम क़रीब आया, तो क़ुरैश वलीद बिन मुग़ीरा से मिले ताकि तय करें कि आनेवाले अरबों को पैगंबर (ﷺ) के बारे में क्या बताएँ। वलीद ने हर सुझाव ठुकरा दिया: क़ुरआन किसी ज्योतिषी की बुदबुदाहट नहीं था, न किसी पागल की बात, और न कविता, क्योंकि वह हर तरह की कविता जानता था; और न ही जादू था। उसने कहा कि उसकी वाणी मीठी है, खजूर के उस पेड़ की तरह जिसकी डालियाँ फल देती हैं। अंत में उसने कहा कि सबसे क़रीबी आरोप यह होगा कि वह एक जादूगर है जिसकी बातें आदमी को उसके परिवार से अलग कर देती हैं। इब्न इसहाक़ बताते हैं कि क़ुरआन 74:11-25 वलीद के बारे में उतरीं।
“और आप इससे पहले न कोई पुस्तक पढ़ते थे और न उसे अपने दाहिने हाथ से लिखते थे। (यदि ऐसा होता) तो असत्यवादी अवश्य संदेह करते।”
क़ुरैश का एक आदमी जिसने इसे सुना
जुबैर बिन मुतइम क़ुरैश के एक आदमी थे जो बद्र के क़ैदियों के सिलसिले में मदीना आए थे। वे अभी मुसलमान नहीं थे। उन्होंने पैगंबर (ﷺ) को मग़रिब की नमाज़ में सूरह अत-तूर (सूरह 52) पढ़ते सुना। उन्होंने कहा कि तभी ईमान पहली बार उनके दिल में बैठा। तिलावत उन आयतों तक पहुँची जो पूछती हैं कि क्या वे बिना किसी चीज़ के पैदा हो गए, या उन्होंने आकाशों और धरती को पैदा किया। तब, उन्होंने कहा, उनका दिल उड़ने ही वाला था।
जुबैर बिन मुतइम बताते हैं कि उन्होंने पैगंबर (ﷺ) को मग़रिब की नमाज़ में सूरह अत-तूर पढ़ते सुना, उस समय जब ईमान पहली बार उनके दिल में बैठा। इसी रिवायत में पैगंबर बद्र के क़ैदियों के बारे में बात करते हैं।
जुबैर बिन मुतइम, जो बद्र के क़ैदियों के सिलसिले में मदीना आए थे, बताते हैं कि उन्होंने पैगंबर (ﷺ) को मग़रिब की नमाज़ में सूरह अत-तूर पढ़ते सुना।
जुबैर बिन मुतइम बताते हैं कि उन्होंने पैगंबर (ﷺ) को मग़रिब की नमाज़ में सूरह अत-तूर पढ़ते सुना। जब वे उन आयतों पर पहुँचे जो पूछती हैं कि क्या वे बिना किसी चीज़ के पैदा हो गए, या वे स्वयं पैदा करनेवाले हैं, या उन्होंने आसमानों और धरती को पैदा किया, तो जुबैर कहते हैं कि उनका दिल उड़ने ही वाला था।
“या वे बिना किसी चीज़ के पैदा हो गए हैं, या वे (स्वयं) पैदा करने वाले हैं? या उन्होंने आकाशों और धरती को पैदा किया है? बल्कि वे विश्वास ही नहीं करते।”
नक़ल करने वाले, तब और उसके बाद
पैगंबर (ﷺ) के अपने जीवनकाल में नुबुव्वत के प्रतिद्वंद्वी दावेदार सामने आए। उनमें से एक मुसैलिमा था, जिसे पैगंबर (ﷺ) ने उस सपने से जोड़ा जिसमें दो झूठे थे जो उनके बाद नुबुव्वत का दावा करेंगे। बाद की सदियों में भी क़ुरआन की नक़ल की कोशिशें हुई हैं। हर एक एक पाठ है जो सामने रखा है और जिसे अरबी पढ़ने वाला कोई भी तुलना कर सकता है। कोई भी क़ुरआन के बराबर के रूप में स्थायी स्वीकृति नहीं पा सका।
इब्न अब्बास बताते हैं कि मुसैलिमा, जो ‘झूठा’ के नाम से जाना गया, पैगंबर (ﷺ) के जीवनकाल में अपने क़बीले के बहुत से लोगों के साथ मदीना आया और कहा कि अगर उसे उनके बाद शासन दे दिया जाए तो वह पैगंबर का अनुसरण करेगा। पैगंबर ने उसे इनकार कर दिया और कहा कि उनके विचार में मुसैलिमा वही आदमी है जो उन्हें एक सपने में दिखाया गया था। अबू हुरैरा के माध्यम से रिवायत में पैगंबर का सोने के दो कंगनों वाला सपना भी जुड़ता है, जिसका अर्थ उन्होंने यह लिया कि उनके बाद नबूवत का दावा करनेवाले दो झूठे सामने आएँगे; वे अनसी और मुसैलिमा निकले।
“आप कह दें : यदि समस्त मनुष्य तथा जिन्न इस बात पर एकत्रित हो जाएँ कि इस क़ुरआन के समान (कोई पुस्तक) ले आएँ, तो इस जैसी पुस्तक नहीं ला सकेंगे, चाहे वे एक-दूसरे के सहायक ही क्यों न हो जाएँ!”
एक दूसरी खुली परख
क़ुरआन अपने पाठकों को यह भी निमंत्रण देता है कि उसमें ग़लती खोजें। वह कहता है कि ईश्वर (﷾) के सिवा किसी और की किताब में बहुत-सी असंगति होती। दोनों परखें पन्ने पर हैं, कोई भी उन्हें आज़मा सकता है, और पहले के नबियों के चमत्कारों के विपरीत, इसे आज जाँचा जा सकता है।
“तो क्या वे क़ुरआन पर चिंतन मनन नहीं करते? यदि वह अल्लाह के सिवा किसी और की ओर से होता, तो वे उसमें बहुत-सा अंतर्विरोध (असंगति) पाते।”
“आप कह दें : यदि समस्त मनुष्य तथा जिन्न इस बात पर एकत्रित हो जाएँ कि इस क़ुरआन के समान (कोई पुस्तक) ले आएँ, तो इस जैसी पुस्तक नहीं ला सकेंगे, चाहे वे एक-दूसरे के सहायक ही क्यों न हो जाएँ!”
अरबी व्याकरण क़ुरआन के बाद आया
अरबी व्याकरण के नियम क़ुरआन के बाद, आठवीं शताब्दी में, बनाए गए। व्याकरणविदों ने उन्हें ज़्यादातर क़ुरआन और अरबों की पुरानी कविता से बनाया। इसलिए चुनौती के पहले फ़ैसला करने वालों को किसी नियम-पुस्तक की ज़रूरत नहीं थी। वे उस जीवित भाषा के उस्ताद थे जिससे बाद में नियम निकाले गए।
बताते हैं कि अरबी व्याकरण का व्यवस्थित अध्ययन आठवीं शताब्दी में शुरू हुआ, जिसकी प्रेरणा क़ुरआन को सही ढंग से पढ़ने और समझाने की ज़रूरत थी, और कि आरंभिक व्याकरणविदों ने, सबसे बढ़कर सीबवैह ने, भाषा के लिए अपने मुख्य सबूत के रूप में क़ुरआन और आरंभिक अरबी कविता को लिया।
संदेहवादी को जवाब
क़ुरआन 2:23 — सूरह अल-बक़रा, आयत 23
“और यदि तुम उस (पुस्तक) के बारे में किसी संदेह में हो, जो हमने अपने बंदे पर उतारा है, तो उसके समान एक सूरत ले आओ और अल्लाह के सिवा अपने समर्थकों को भी बुला लो, यदि तुम सच्चे हो।”
किस बात के लिए उद्धृत
संदेहवादी कहते हैं कि साहित्यिक गुणवत्ता पसंद का मामला है, और क्योंकि हर कोशिश का फ़ैसला मुसलमान करते हैं, चुनौती कभी हारी नहीं जा सकती।
जवाब
पहले फ़ैसला करने वाले मुसलमान नहीं थे। वे क़ुरैश थे, अपनी भाषा के उस्ताद, जो पैगंबर (ﷺ) को हारा हुआ देखना चाहते थे और डींग मारते थे कि वे भी ऐसा कह सकते हैं। उन्होंने एक सूरह बनाने के बजाय बहिष्कार, यातना और युद्ध चुना। और परख आज भी खुली है: हर कोशिश एक पाठ है जिसे अरबी पढ़ने वाला कोई भी क़ुरआन के साथ रखकर देख सकता है।
निष्कर्ष — जो लोग चुनौती पूरी करने के लिए सबसे अच्छी स्थिति में थे, और सबसे उत्सुक भी, वे इसे पूरा नहीं कर सके, और यह फ़ैसला मुसलमानों ने नहीं दिया।
दृष्टिकोण
कन्फ़्यूशियस: स्वर्ग बिना शब्दों के सिखाता है
कन्फ़्यूशियस ने कहा कि स्वर्ग बोलता नहीं: चारों ऋतुएँ अपने क्रम पर चलती हैं और सब वस्तुएँ उत्पन्न होती हैं, फिर भी स्वर्ग कुछ नहीं कहता। कुछ कन्फ़्यूशियस मानने वाले निष्कर्ष निकालते हैं कि किसी किताब की सुंदरता स्वर्ग के बारे में कुछ साबित नहीं करती।
क्या स्वर्ग बोलता है? ऋतुएँ अपने क्रम पर चलती हैं और सब वस्तुएँ उत्पन्न होती हैं, पर स्वर्ग कुछ नहीं कहता, इसलिए किसी किताब का स्वर्ग का वचन होना ज़रूरी नहीं।
खंडन
ऋतुएँ निशानियाँ हैं, और क़ुरआन सहमत है। पर कन्फ़्यूशियस ने कभी दावा नहीं किया कि उनकी सूक्तियाँ (एनालेक्ट्स) स्वर्ग से आईं, इसलिए उन्होंने कोई परख नहीं रखी। क़ुरआन ईश्वर (﷾) का वचन होने का दावा करता है, और इस दावे को एक ऐसी परख पर दाँव पर लगाता है जिसे कोई भी आज़मा सकता है: इस जैसी एक सूरह ले आओ। जो लोग इसे पूरा करने में सबसे सक्षम थे, उन्होंने इसके बजाय युद्ध चुना।
संदेहवादी दृष्टि
एक संदेहवादी कह सकता है कि साहित्यिक गुणवत्ता पसंद का मामला है, इसलिए कोई पाठ बेजोड़ साबित नहीं किया जा सकता।
साहित्यिक गुणवत्ता पसंद का मामला है, और जिस चुनौती का फ़ैसला ईमान वाले करें, वह कभी हारी नहीं जा सकती।
खंडन
चुनौती पसंद पर नहीं छोड़ी गई। उसके पहले फ़ैसला करने वाले क़ुरैश थे, अरबी के उस्ताद, जो पैगंबर (ﷺ) को हारा हुआ देखना चाहते थे। उनकी सुनवाई में पढ़ा गया क़ुरआन उनकी यह डींग दर्ज करता है कि वे भी ऐसा कह सकते हैं (8:31)। फिर भी उनका सबसे अच्छा पारखी इसे कविता या काहिनों की बात की श्रेणी में नहीं रख सका, और उन्होंने एक सूरह के बजाय बहिष्कार, यातना और युद्ध चुना।
इस्लामी दृष्टिकोण
क़ुरआन अपनी उत्पत्ति को एक ऐसी परख पर दाँव पर लगाता है जिसे कोई भी आज़मा सकता है। जो लोग इसे पूरा करने में सबसे सक्षम थे, उनके पास कोशिश करने का हर कारण था। वे यह भाषा बोलते थे और अपनी कला के शिखर पर थे। उन्होंने इसके बजाय युद्ध चुना। पैगंबर (ﷺ) एक ऐसी किताब लाए जिसकी न नक़ल उसके सबसे अच्छे आलोचक कर सके, न उसे किसी श्रेणी में रख सके।
क़ुरआन संदेह करने वालों को चुनौती देता है कि उस जैसी एक सूरह ले आओ, और कहता है कि मनुष्य और जिन्न मिलकर भी नहीं ला सकते।
क़ुरैश ने पैगंबर (ﷺ) को क़ुरआन जैसी एक सूरह के बजाय बहिष्कार, यातना और युद्ध से जवाब दिया।
क़ुरैश ने अपने लोगों से कहा कि क़ुरआन न सुनो और उसकी तिलावत में शोर करो।
उनका प्रमुख भाषा-पारखी वलीद बिन मुग़ीरा इसे न कविता कह सका, न काहिनों की बात। जैसा क़ुरआन दर्ज करता है, वह इसे केवल जादू कह सका।
जुबैर बिन मुतइम ने मुसलमान बनने से पहले सूरह अत-तूर की तिलावत सुनी। उन्होंने कहा कि तभी ईमान पहली बार उनके दिल में बैठा।
मुसैलिमा जैसे प्रतिद्वंद्वियों ने पैगंबर (ﷺ) के जीवनकाल में नबी होने का दावा किया। उसके बाद कोई नक़ल क़ुरआन के बराबर के रूप में स्थायी रूप से स्वीकार नहीं हुई।
अरबी व्याकरण बाद में ज़्यादातर क़ुरआन और आरंभिक अरबी कविता से व्यवस्थित किया गया।
क़ुरआन की नक़ल न हो पाना इस बात की निशानी है कि वह ईश्वर (﷾) की वाणी है।