संक्षिप्त उत्तर

नहीं। क़ुरआन उस पर संदेह करने वाले हर व्यक्ति को चुनौती देता है कि उस जैसी एक ही सूरह ले आओ। वह कहता है कि सारे मनुष्य और जिन्न (अदृश्य प्राणी) मिलकर भी ऐसा नहीं कर सकते। चुनौती पहले मक्का के अरबों के सामने रखी गई, एक ऐसी क़ौम जिसकी सबसे बड़ी कला कविता थी। मक्का के प्रमुख क़बीले क़ुरैश चाहते थे कि पैगंबर (ﷺ) को चुप करा दिया जाए। उन्होंने उनके क़बीले का बहिष्कार किया, उनके अनुयायियों को यातनाएँ दीं और युद्ध किया, पर कभी एक सूरह नहीं बनाई। उनके सबसे अच्छे आलोचक, वलीद बिन मुग़ीरा, ने कहा कि यह न कविता है न काहिनों (भविष्य बताने वालों) की बात। आख़िर में वह इसे केवल जादू कह सका, एक ऐसा फ़ैसला जिसे क़ुरआन दर्ज करता है। मुसैलिमा जैसे नुबुव्वत के झूठे दावेदार उठे, और अरबी जानने वालों के बीच कोई नक़ल स्थायी स्वीकृति नहीं पा सकी। इस्लाम सिखाता है कि यह इस बात की निशानी है कि क़ुरआन ईश्वर (﷾) की ओर से है।

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