संक्षिप्त उत्तर

इस्लाम में ईश्वर (﷾) से प्रेम करने का अर्थ है उससे किसी भी व्यक्ति या किसी भी चीज़ से अधिक प्रेम करना, और उसकी आज्ञा मानकर इसे दिखाना। किसी व्यक्ति के पास जो भी अच्छी चीज़ है, वह उसी से आती है, इसलिए वह सबसे बड़े प्रेम का हक़दार है। क़ुरआन कहता है कि ईमान वाले अल्लाह (﷾) से प्रेम में सबसे बढ़कर होते हैं। वह पैगंबर (ﷺ) से कहलवाता है: यदि तुम अल्लाह (﷾) से प्रेम करते हो, तो मेरा अनुसरण करो, अल्लाह (﷾) तुमसे प्रेम करेगा। यूहन्ना के सुसमाचार में यीशु ने ऐसा ही नियम सिखाया: यदि तुम मुझ से प्रेम रखते हो, तो मेरी आज्ञाओं को मानोगे। मुसलमान पैगंबर (ﷺ) से इसलिए प्रेम करते हैं कि ईश्वर (﷾) ने उन्हें भेजा, ईश्वर (﷾) की जगह नहीं। ईश्वर (﷾) से प्रेम का अर्थ उसके लिए उन लोगों से प्रेम करना भी है जिनसे वह प्रेम करता है। और जब ईश्वर (﷾) किसी बंदे से प्रेम करता है, तो वह दूसरों के दिलों में उस व्यक्ति के लिए प्रेम रख देता है।

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