संक्षिप्त उत्तर

मुसलमान एक ईश्वर (﷾), अल्लाह (﷾), पर ईमान रखते हैं, जिसकी अकेले इबादत की जानी चाहिए। उसका न कोई साझी है, न कोई बेटा और न कोई बराबर। वे उसके फ़रिश्तों पर ईमान रखते हैं। वे उन किताबों पर ईमान रखते हैं जो उसने उतारीं, जैसे वे पहली बार दी गई थीं। उनमें तौरात, ज़बूर, इंजील (वह सुसमाचार जिसका ईसा ने प्रचार किया) और क़ुरआन हैं। वे उसके सब नबियों पर ईमान रखते हैं, आदम से लेकर नूह, इब्राहीम, मूसा और ईसा से होते हुए आख़िरी नबी मुहम्मद (ﷺ) तक। वे सब मनुष्य थे, और सब एक ही संदेश लाए: केवल ईश्वर (﷾) की इबादत करो। वे क़यामत के दिन पर ईमान रखते हैं, जब हर किसी को उठाया जाएगा और उसके ईमान और कर्मों के अनुसार उसका फ़ैसला होगा। और वे ईश्वर (﷾) की तक़दीर पर ईमान रखते हैं: वह सब कुछ जानता और चाहता है, जबकि हर व्यक्ति चुनने के लिए स्वतंत्र है और अपने चुनाव का जवाबदेह है। इस्लाम जीवन का एक पूरा तरीक़ा है। ईमान पहले आता है, और वह इबादत, चरित्र, परिवार, काम और क़ानून को आकार देता है।

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