संक्षिप्त उत्तर

इस्लाम में युद्ध का एक क़ानून है, जो क़ुरआन में और पैगंबर मुहम्मद (ﷺ) द्वारा तय किया गया। बहुत-से आरंभिक विद्वान एक आयत को लड़ाई की अनुमति देने वाली पहली आयत मानते हैं। वह उन लोगों को दी गई जिन्हें उनके घरों से निकाल दिया गया था। वह गिरजों और यहूदियों के पूजा-स्थलों को ईश्वर (﷾) के उन घरों में गिनाती है जिनकी रक्षा लड़ाई करती है। क़ुरआन लड़ाई की अनुमति केवल उनके विरुद्ध देता है जो लड़ते हैं, और कभी सीमा से आगे नहीं। जब शत्रु शांति की पेशकश करे तो उसे स्वीकार करना होगा, और जो शत्रु शरण माँगे उसे सुरक्षा देनी होगी। स्त्रियों और बच्चों को नहीं मारा जाना चाहिए। मरे हुओं के अंग नहीं काटे जाने चाहिए, वचन नहीं तोड़े जाने चाहिए, और किसी को आग से सज़ा नहीं दी जा सकती। जब उनके सेनापति ने इन सीमाओं को तोड़ा, तो पैगंबर (ﷺ) ने सबके सामने उसके किए से अपने आप को अलग किया। फ़क़ीह शैबानी ने इस क़ानून पर एक पूरी किताब ह्यूगो ग्रोशियस से आठ सौ वर्ष से भी अधिक पहले लिखी, जिन्हें अक्सर अंतरराष्ट्रीय क़ानून का जनक कहा जाता है। इसमें से कुछ भी किसी व्यक्ति या समूह को लड़ने का अधिकार नहीं देता: इस्लामी क़ानून में युद्ध केवल किसी राज्य के शासक का काम है, और मुसलमान जिस भी देश में रहें उसके क़ानून का पालन करते हैं (17:34)।

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