संक्षिप्त उत्तर

हाँ, इस शब्द के सच्चे अर्थ में। ‘मुस्लिम’ अरबी में उसे कहते हैं जो ईश्वर (﷾) के आगे समर्पण करे। बाग़ में ईसा ने प्रार्थना की: “मेरी नहीं परन्तु तेरी ही इच्छा पूरी हो”। वे प्रार्थना के लिए मुँह के बल गिरे, जैसे मुसलमान करते हैं। उन्होंने रोज़ा रखा, उनका ख़तना हुआ, और उन्होंने मूसा की व्यवस्था का पालन किया। उन्होंने सिखाया कि ईश्वर (﷾) एक है और केवल उसी की उपासना की जाए। क़ुरआन कहता है कि उनके शिष्यों ने घोषणा की: “निःसंदेह हम आज्ञाकारी हैं” (अरबी में ‘मुस्लिमून’, यानी मुसलमान)। वह कहता है कि इब्राहीम ने भी अपनी इच्छा ईश्वर (﷾) के आगे झुका दी। पैगंबर मुहम्मद (ﷺ) ने कहा कि नबी भाई-भाई हैं जिनका दीन (जीवन का तरीक़ा) एक है। इसका अर्थ यह नहीं कि ईसा ने वह शरीअत मानी जो बाद में मुहम्मद (ﷺ) को दी गई। इसका अर्थ है कि उन्होंने ईश्वर (﷾) के आगे समर्पण किया। वही समर्पण इस्लाम है, ईश्वर (﷾) को सौंपा गया जीवन का पूरा तरीक़ा।

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