संक्षिप्त उत्तर

नहीं। क़ुरआन एक है, जो कुछ गिने-चुने मान्य तरीक़ों से पढ़ा जाता है। पैगंबर (ﷺ) ने कहा कि यह सात तरीक़ों में पढ़े जाने के लिए उतारा गया, जिन्हें अहरुफ़ कहा जाता है। उन्होंने यह तब कहा जब दो सहाबियों ने एक ही सूरह अलग-अलग पढ़ी, और उन्होंने दोनों को मंज़ूर किया। ये तरीक़े आसानी के लिए दिए गए, ताकि हर व्यक्ति उस तरीक़े से पढ़ सके जो उसके लिए आसान हो। आज ज़्यादातर मुसलमान हफ़्स नाम की क़िराअत पढ़ते हैं। उत्तरी और पश्चिमी अफ़्रीका में बहुत-से लोग वर्श पढ़ते हैं। दोनों में स्वरों, ध्वनियों और कुछ गिने-चुने शब्दों का फ़र्क़ है। पहली सूरह में एक में ‘बदले के दिन का मालिक’ है और दूसरी में ‘बादशाह’। दोनों ईश्वर (﷾) के बारे में सच हैं। कोई क़िराअत दूसरी का खंडन नहीं करती, और कोई किसी अक़ीदे को नहीं बदलती: न ईश्वर (﷾) के बारे में, न ईसा के बारे में, न आख़िरत के बारे में। इस्लाम का जवाब है एक क़ुरआन, जिसे ख़ुद पैगंबर (ﷺ) ने सिखाया।

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