संक्षिप्त उत्तर

हाँ। क़ुरआन हमेशा सबसे पहले पढ़कर सुनाई जाने वाली किताब रहा है। उसके नाम का ही अर्थ है ‘पाठ’। पैगंबर (ﷺ) ने उसे ऊँची आवाज़ में सिखाया। उनके सहाबा ने उसे कंठस्थ किया और अपने शिष्यों को उसी तरह सिखाया। वह कड़ी कभी नहीं टूटी। आज एक विद्यार्थी पूरा क़ुरआन एक शिक्षक को सुनाता है। फिर उसे एक प्रमाणपत्र मिलता है, जिसे इजाज़ा कहते हैं। उसमें उसके शिक्षकों के नाम पैगंबर (ﷺ) तक एक कड़ी में दर्ज होते हैं। अधिकतर मुसलमान जो क़िराअत पढ़ते हैं, हफ़्स, वह कूफ़ा के आसिम के ज़रिए उस्मान, अली और इब्न मसऊद तक पहुँचती है। रमज़ान में बहुत सी मस्जिदें पूरा क़ुरआन याद से पढ़ती हैं। पीछे नमाज़ पढ़ने वाले हर चूक को सुधारते हैं। अगर हर छपी हुई प्रति खो जाए, तो उसे याद से फिर लिखा जा सकता है।

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