संक्षिप्त उत्तर

हाँ। क़ुरआन की सबसे पुरानी पांडुलिपियाँ वैसे ही पढ़ी जाती हैं जैसे आज क़ुरआन पढ़ा जाता है। बर्मिंघम विश्वविद्यालय के दो पन्नों की 2015 में कार्बन डेटिंग हुई, जिसके अनुसार वे सबसे संभावित रूप से 568 और 645 ई. के बीच के हैं। पैगंबर (ﷺ) लगभग 570 से 632 तक जीवित रहे। वर्तनी की छोटी-छोटी बातों को छोड़कर, उनका पाठ आज का ही पाठ है। दूसरी आरंभिक प्रतियाँ आज के पाठ से केवल वर्तनी, आयतों की गिनती और नक़ल करनेवाले की इक्का-दुक्का चूकों में अलग हैं। उनमें इस्तांबुल का एक बड़ा कोडेक्स (हाथ से लिखी किताब) और पेरिस और बर्लिन के आरंभिक पन्ने शामिल हैं। किसी में भी कोई ऐसी सूरह या आयत नहीं जो आज के क़ुरआन में न हो। सना में एक चर्मपत्र के नीचे एक पुराना, धोकर मिटाया हुआ पाठ है, जिसके ऊपर आज का पाठ है। वह छोटे शब्दों, सूरतों के क्रम, आयतों की एक आपस में बदली हुई जोड़ी और एक ग़ायब आयत में अलग है। उसके संपादक उसे एक सहाबी की निजी प्रति मानते हैं, और आज के पाठ को अधिक विश्वसनीय। यह क़ुरआन के इस वादे से मेल खाता है कि ईश्वर (﷾) उसकी रक्षा करेगा।

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