संक्षिप्त उत्तर

क़ुरआन कहता है कि बच्चा चरणों में बढ़ता है। वह दोनों माता-पिता से मिली-जुली एक बूँद के रूप में शुरू होता है, जो एक सुरक्षित स्थान में ठहरती है। वह एक अलक़ा बन जाता है, यानी ऐसी चीज़ जो चिपकी रहती है। वह एक मुज़्ग़ा बन जाता है, यानी एक छोटी बोटी जो चबाई हुई सी दिखती है, कुछ बनी हुई और कुछ बिना बनी। फिर हड्डियाँ आती हैं, जिन्हें माँस पहनाया जाता है, यह सब अंधेरे के तीन पर्दों के भीतर। पहले चरण भ्रूणविज्ञानियों के देखे से मेल खाते हैं। अपने पहले सप्ताहों में भ्रूण गर्भाशय की दीवार से चिपका रहता है। इसके कुछ ही बाद वह कुछ मिलीमीटर लंबी एक मुड़ी हुई बोटी होता है, जिसकी पीठ पर उभार होते हैं। क़ुरआन यहाँ चिकित्सा नहीं सिखा रहा; वह निशानियाँ देता है। उतना ही अर्थपूर्ण यह है कि वह क्या छोड़ देता है। उस समय की यूनानी चिकित्सा दो सींगों वाला गर्भाशय और मासिक धर्म के रक्त पर पलने वाला बच्चा सिखाती थी। क़ुरआन इनमें से कुछ भी नहीं दोहराता। इस्लाम सिखाता है कि यह इस बात की निशानी है कि क़ुरआन कहाँ से आया है।

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