संक्षिप्त उत्तर

नहीं। यह मुसलमानों को यहूदियों और ईसाइयों से लड़ने का कोई स्थायी आदेश नहीं है। यह हिजरत के बाद नौवें साल में आया, जब पैगंबर (ﷺ) ने तबूक की ओर कूच किया। उन्होंने इसलिए कूच किया कि ख़बरें आई थीं कि बाइज़ेंटाइन रोमियों ने शाम (सीरिया) में एक बड़ी सेना इकट्ठी की है। आख़िर में वहाँ कोई लड़ाई नहीं हुई। क्लासिकी इस्लामी फ़िक़्ह में केवल किसी राज्य का शासक युद्ध का फ़ैसला कर सकता था, कभी कोई अकेला व्यक्ति नहीं। तब भी, जैसे ही दूसरा पक्ष जज़िया, यानी रक्षा के बदले दिया जाने वाला कर, देने पर राज़ी हो जाता, लड़ाई रोकनी होती थी। बाद के मुस्लिम राज्यों ने जज़िया को इस आयत पर आधारित किया, पर आज कोई मुस्लिम देश अपने ग़ैर-मुस्लिम नागरिकों से इसे नहीं माँगता। इसलिए यह आयत आज किसी को किसी से लड़ने की छूट नहीं देती। मुसलमान उस देश के साथ अपने समझौते से बँधा है जिसमें वह रहता है, और उसके क़ानून मानता है। क़ुरआन मुसलमानों को उन सबके साथ अच्छा व्यवहार और न्याय करने देता है जो उनसे नहीं लड़ते। वह उन्हें यहूदियों और ईसाइयों का खाना खाने देता है, और एक मुसलमान पुरुष को किसी यहूदी या ईसाई स्त्री से विवाह करने देता है।

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