संक्षिप्त उत्तर

नहीं। क़ुरआन ख़ुद अपने पाठकों को पैगंबर (ﷺ) की ओर भेजता है। वह ईमान वालों से कहता है कि अल्लाह (﷾) का आज्ञापालन करें और रसूल का आज्ञापालन करें, और जो कुछ रसूल उन्हें दें, उसे ले लें। वह कहता है कि वे इसलिए भेजे गए कि जो उतारा गया उसे खोलकर बयान करें, और किताब और हिकमत की शिक्षा दें। वह ऐसे आदेशों की बात करता है जो उसमें लिखे नहीं हैं, जैसे नमाज़ का पहला क़िबला, जिसके बारे में अल्लाह (﷾) कहता है कि उसने उसे निर्धारित किया था। वह मुसलमानों से नमाज़ पढ़ने को कहता है, लेकिन यह नहीं बताता कि दिन में कितनी नमाज़ें, या हर एक में कितनी रकअतें। यह पैगंबर (ﷺ) ने दिखाया। उनकी शिक्षा उन्हीं लोगों ने आगे पहुँचाई जिन्होंने क़ुरआन आगे पहुँचाया, और उसकी जाँच उस सावधानी से हुई जो बहुत कम इतिहासों को मिली है। इसलिए एक मुसलमान पैगंबर (ﷺ) का अनुसरण करके क़ुरआन का अनुसरण करता है, जैसा क़ुरआन आदेश देता है।

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