संक्षिप्त उत्तर

हाँ। इस्लाम सिखाता है कि जन्नत और जहन्नम दोनों हमेशा रहते हैं। जहन्नम उनके लिए हमेशा का है जो संदेश पहुँचने के बाद ईमान को ठुकराते हुए मरते हैं। किसी को सज़ा नहीं दी जाती जब तक कोई रसूल उसे सावधान न कर दे। हर कर्म तौला जाता है, एक कण के वज़न तक, और जहन्नम में कर्मों के अनुसार दर्जे हैं। कोई अदालत सज़ा को इस बात से नहीं नापती कि अपराध में कितना समय लगा। हत्या एक पल में होती है, और उसकी सज़ा वर्षों तक चलती है। आख़िरत में जो बाक़ी रहता है, वह वह हालत है जिसमें इंसान मरता है। इस्लाम संदेश आ जाने के बाद बिना ईमान के मरने को उसके विरुद्ध सबसे गंभीर अन्याय मानता है जिसने सब कुछ दिया। एक मुसलमान हत्यारा भी छोड़ा नहीं जाता। उसके नेक काम उन लोगों को दे दिए जाते हैं जिन पर उसने ज़ुल्म किया। ईश्वर (﷾) की दया माँ की दया से बड़ी है, और दरवाज़ा मौत तक खुला रहता है।

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