संक्षिप्त उत्तर

उस अर्थ में नहीं जो ये शब्द सुझाते हैं। बौद्ध ग्रंथ अपना एक शब्द इस्तेमाल करते हैं, दुःख, जिसका अर्थ पीड़ा भी है और असंतोषजनकता भी। पहला उपदेश जन्म, बुढ़ापे, बीमारी और मृत्यु को दुःख कहता है। धम्मपद कहता है कि सब संस्कार दुःख हैं। फिर भी यही ग्रंथ मानते हैं कि सुखद अनुभूति सच्ची है। इस्लाम यह नहीं कहता कि सारा जीवन दुख है। उसका उत्तर है कि जीवन एक परीक्षा है, जिसमें भलाई भी है और कठिनाई भी। दोनों धर्म सहमत हैं कि यह संसार बीत जाता है। असली अंतर उपाय में है। बौद्ध धर्म कहता है कि तृष्णा और पुनर्जन्म के चक्र को समाप्त करो। क़ुरआन कहता है कि दिल को उस एक की ओर मोड़ो जो नहीं बीतता। धरती पर जो कुछ है वह नष्ट होने वाला है, लेकिन तुम्हारे पालनहार का चेहरा बाक़ी रहेगा।

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