संक्षिप्त उत्तर

एक सच्चे दोस्त बनिए, चाहे आपका दोस्त कभी मुसलमान बने या न बने। पहले सुनिए, और पूछिए कि वे अपने मत तक कैसे पहुँचे। बुद्धि से और उस बात से शुरू कीजिए जिसे आपका दोस्त पहले से मानता है। आयतें उद्धृत करने से पहले ऐसे कारण दीजिए जिन्हें कोई भी परख सके। एक समय में एक तर्क लीजिए, और जब आप न जानते हों तो कह दीजिए। नरमी से बोलिए (20:44)। कभी मज़ाक़ न उड़ाइए, और कभी न कहिए कि नास्तिक अनैतिक होते हैं या चुपके से विश्वास करते हैं। इतिहास या राजनीति की बात ख़ुद न छेड़िए। अगर आपका दोस्त पूछे कि क्या आप उनका धर्म बदलवाने की कोशिश कर रहे हैं, तो ईमानदार जवाब है नहीं: आप ऐसा कर ही नहीं सकते, क्योंकि दिलों को केवल ईश्वर (﷾) हिदायत देता है (28:56)। आप एक दोस्ताना बातचीत में, बहस में नहीं, उन्हें इस्लाम से परिचित करा रहे हैं, और चुनाव उनका है (2:256)। अगर उनका जवाब नहीं हो, तो वैसे ख़त्म कीजिए जैसे मुसलमानों को सिखाया गया है: “तुम्हारे लिए तुम्हारा धर्म तथा मेरे लिए मेरा धर्म है” (109:6)। फिर दोस्ती बनाए रखिए।

पूरी व्याख्या पढ़ें

अपने सहेजे गए पृष्ठ देखें