संक्षिप्त उत्तर

हाँ, उसी तरह जैसे हम ज़्यादातर अहम बातें जानते हैं। हमें हर संभव शक से परे सबूत की ज़रूरत नहीं, बस इतने मज़बूत कारणों की जो कोई उचित शक न छोड़ें। 19वीं शताब्दी के अंग्रेज़ जीवविज्ञानी थॉमस हक्सले ने, जिन्होंने ‘अज्ञेयवादी’ शब्द गढ़ा, दो हिस्सों वाला एक नियम रखा। अपने तर्क का वहाँ तक पीछा करो जहाँ तक वह तुम्हें ले जाए, और ऐसी निश्चितता का दावा मत करो जो दिखाई न गई हो। यह पृष्ठ तर्क देता है कि उतनी दूर तक पीछा किया गया तर्क एक सृष्टिकर्ता तक पहुँचता है। हक्सले ख़ुद वहाँ तक नहीं पहुँचे। तर्क की तीन धाराएँ एक ही दिशा में इशारा करती हैं। वे हैं ब्रह्मांड की हर चीज़ का किसी और पर निर्भर होना, इस बात का सबूत कि उसकी एक शुरुआत थी, और वह व्यवस्था जिसे हमारा मन पढ़ सकता है। इस्लाम लोगों से सृष्टि पर विचार करने को कहता है, और मानता है कि निश्चितता उसी देखने से पैदा होती है। अगला कदम है ख़ुद कारणों को तौलना, इससे शुरू करके कि हम कैसे जानते हैं कि ईश्वर (﷾) मौजूद है।

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