संक्षिप्त उत्तर

यह मानना कि ईश्वर (﷾) एक है, अपने आप में काफ़ी नहीं है। क़ुरआन माँगता है कि केवल उसी की इबादत हो। वह कहता है कि मक्का के लोग भी मानते थे कि अल्लाह (﷾) ने उन्हें, और आकाशों और धरती को पैदा किया। फिर भी वे दूसरी हस्तियों की पूजा करते थे, यह कहते हुए कि ये उन्हें ईश्वर (﷾) के क़रीब कर देंगी और उनकी सिफ़ारिश करेंगी। क़ुरआन कहता है कि हर रसूल एक ही संदेश लाया: अल्लाह (﷾) के सिवा कोई पूज्य नहीं, इसलिए उसी की इबादत करो। हिंदू ग्रंथ गीता भी इसी ओर इशारा करती है। कृष्ण उस व्यक्ति को सबसे ऊँचा मानते हैं जिसकी उपासना केवल एक सत्ता की ओर है। वे बहुत दुराचारी व्यक्ति को भी अच्छा कहते हैं, अगर वह उनकी उपासना करे, “किसी और की उपासना न करते हुए”। फिर भी घरों और मंदिरों में बहुत-सी हिंदू पूजा अनेक देवताओं और उनकी मूर्तियों को दी जाती है। हिंदू जो उत्तर देते हैं, उनका जवाब नीचे है। इस्लाम नमाज़, सजदा और भेंट केवल ईश्वर (﷾) को देता है।

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