संक्षिप्त उत्तर

नहीं। क़ुरआन अपने लिए यह परीक्षा ख़ुद रखता है। वह कहता है कि अगर वह ईश्वर (﷾) के सिवा किसी और की ओर से होता, तो लोग उसमें बहुत से विरोधाभास पाते। चौदह शताब्दियों से आलोचक ढूँढते आए हैं। उनकी आपत्तियाँ अरबी व्याकरण, बोलने के किसी पुराने ढंग, संदर्भ से अलग की गई किसी आयत, या चरणों में दिए गए किसी क़ानून पर टिकी हैं। कोई भी यह नहीं दिखाती कि क़ुरआन कहता हो कि कोई बात एक तरह हुई और दूसरी जगह कहता हो कि उलटी तरह हुई। बाइबिल में इस तरह के विरोधाभास हैं। एक पुस्तक कहती है कि राजा अहज्याह बाईस वर्ष की आयु में राज्य करने लगा, और दूसरी कहती है बयालीस। एक कहती है कि चालीस हज़ार सवार मारे गए, और दूसरी, उसी लड़ाई के बारे में, कहती है चालीस हज़ार प्यादे। क़ुरआन में ऐसी कोई जोड़ी नहीं है। इस्लाम का उत्तर है कि ईश्वर (﷾) के वचन से हम यही आशा रखते हैं।

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