संक्षिप्त उत्तर

नहीं। इस्लाम इस काम के दोनों हिस्सों को मना करता है। आत्महत्या मना है। क़ुरआन कहता है: “अपने आपको क़त्ल न करो”। पैगंबर मुहम्मद (ﷺ) ने चेतावनी दी कि जो कोई ख़ुद को मारता है, उसे जहन्नम की आग में उसी तरीक़े से सज़ा दी जाएगी। निर्दोषों को मारना भी मना है। क़ुरआन किसी भी ऐसी जान को लेने से मना करता है जिसे अल्लाह (﷾) ने पवित्र ठहराया है, सिवाय न्याय और क़ानून के। पैगंबर (ﷺ) ने औरतों और बच्चों को मारने से मना किया, एक वैध युद्ध में भी। उन्होंने कहा कि जो मुसलमान समुदाय पर हमला करे, भले और बुरे दोनों को मारे और सुरक्षा के वचन तोड़े, उसका उनसे कोई संबंध नहीं। बाज़ारों में बम, विमान अपहरण और लोगों को बंधक बनाना, सब इसी पाबंदी में आते हैं। पैगंबर (ﷺ) या उनके साथियों के शब्दों या आचरण में कुछ भी इनकी अनुमति नहीं देता। इस्लामी क़ानून में युद्ध केवल राज्य के शासक का काम है, इसलिए कोई व्यक्ति या समूह कोई हमला नहीं कर सकता, न सैनिकों पर, न नागरिकों पर।

पूरी व्याख्या पढ़ें

अपने सहेजे गए पृष्ठ देखें