संक्षिप्त उत्तर
हाँ, ईश्वर (﷾) की तय की हुई सीमाओं के भीतर। क़ुरआन अपने ख़िलाफ़ अपने दुश्मनों के आरोप दर्ज करता है और तर्क से उनका उत्तर देता है। वह मुसलमानों से कहता है कि सबसे अच्छे ढंग से वाद-विवाद करें, और दूसरों के पूज्यों को बुरा कहने से उन्हें मना करता है। किसी को धर्म में ज़बरदस्ती नहीं लाया जा सकता। पैगंबर (ﷺ) ने अपने मुँह पर किए गए अपमान और आरोप धैर्य से सहे। इस्लाम जिस चीज़ से मना करता है वह है झूठ, बदनामी, ग़ीबत और अपमान। शास्त्रीय इस्लामी क़ानून बदनामी पर सज़ा देता है और पैगंबर (ﷺ) के अपमान को सबसे गंभीर अपराधों में गिनता है। इस्लामी क़ानून कोई भी सज़ा किसी मुस्लिम राज्य की वैध अदालत को, मुक़दमे के बाद, देता है। मुसलमान विद्वान मानते हैं कि कोई व्यक्ति इसे अपने हाथ में नहीं ले सकता। मुसलमान जहाँ भी रहे, वह उस देश के क़ानून का पालन करता है (17:34), और अपमान का उत्तर केवल शब्दों और धैर्य से देता है (3:186)। हर समाज बोलने पर सीमाएँ लगाता है। इंग्लैंड में 2008 तक ईशनिंदा का अपराध था। वह आज भी शपथ के तहत झूठ बोलने और नस्लीय घृणा भड़काने पर सज़ा देता है। अंतर यह है कि बोलने पर इस्लाम की नैतिक सीमाएँ ईश्वर (﷾) की ओर से हैं, और वे खिसकती नहीं।
पूरी व्याख्या
क़ुरआन अपने आलोचकों के शब्द सुरक्षित रखता है
जो किताब अपने आलोचकों को चुप कराना चाहती, वह उनके आरोपों को सुरक्षित नहीं रखती। क़ुरआन उन्हें दर्ज करता है। उन्होंने कहा कि यह एक गढ़ी हुई चीज़ है जिसे लिखने में दूसरों ने मदद की। उन्होंने कहा कि ये पुरानी कहानियाँ हैं जो पैगंबर (ﷺ) को लिखवाई गईं। उन्होंने कहा कि एक आदमी उन्हें सिखाता था। मुसलमान ये आरोप अपनी नमाज़ों में पढ़ते हैं। क़ुरआन तर्क से उत्तर देता है। जिस आदमी की ओर वे इशारा करते थे, वह एक विदेशी भाषा बोलता था, जबकि क़ुरआन स्पष्ट अरबी है।
“तथा काफ़िरों ने कहा : यह तो बस एक झूठ है, जिसे इसने स्वयं गढ़ लिया है और इसपर अन्य लोगों ने उसकी सहायता की है। तो निःसंदेह वे घोर अन्याय और झूठ पर उतर आए हैं। और उन्होंने कहा कि ये पहले लोगों की कहानियाँ हैं, जिन्हें उसने लिखवा लिया है। तो वही उसके सामने सुबह और शाम पढ़ी जाती हैं।”
“तथा निःसंदेह हम जानते हैं कि वे (काफ़िर) कहते हैं : इसे तो एक मानव ही सिखाता है। उस व्यक्ति की भाषा जिसकी ओर वे ग़लत निस्बत कर रहे हैं, अजमी (ग़ैर-अरबी) है और यह स्पष्ट अरबी भाषा है।”
सबसे अच्छे ढंग से वाद-विवाद करो
क़ुरआन पैगंबर (ﷺ) से कहता है कि लोगों को हिकमत के साथ बुलाएँ और सबसे अच्छे और सबसे शालीन ढंग से वाद-विवाद करें। वह मुसलमानों से कहता है कि यहूदियों और ईसाइयों से केवल बेहतर ढंग से वाद-विवाद करें। वह उन्हें दूसरों के पूज्यों को बुरा कहने से भी मना करता है। और वह किसी पर ज़बरदस्ती नहीं करता। धर्म में कोई ज़बरदस्ती नहीं, और जो चाहे ईमान लाए या इनकार करे। वही आयत आग की चेतावनी भी देती है। यह स्वतंत्रता इस दुनिया में सच्ची है, और हिसाब अगली दुनिया में होता है।
“(ऐ नबी!) आप उन्हें अपने पालनहार के मार्ग (इस्लाम) की ओर हिकमत तथा सदुपदेश के साथ बुलाएँ और उनसे ऐसे ढंग से वाद-विवाद करें, जो सबसे उत्तम है। निःसंदेह आपका पालनहार उसे सबसे अधिक जानने वाला है, जो उसके मार्ग से भटक गया और वही सीधे मार्ग पर चलने वालों को भी अधिक जानने वाला है।”
“और तुम किताब वालों से केवल ऐसे तरीक़े से वाद-विवाद करो, जो सबसे उत्तम हो, सिवाय उन लोगों के जिन्होंने उनमें से ज़ुल्म किया। तथा तुम कहो : हम ईमान लाए उसपर, जो हमारी ओर उतारा गया और तुम्हारी ओर उतारा गया, तथा हमारा पूज्य और तुम्हारा पूज्य एक ही है और हम उसी के आज्ञाकारी हैं।”
“और (ऐ ईमान वालो!) उन्हें बुरा न कहो, जिन्हें ये (मुश्रिक) अल्लाह के सिवा पुकारते हैं। अन्यथा, वे अतिक्रम करते हुए अज्ञानतावश अल्लाह को बुरा कहेंगे। इसी प्रकार, हमने प्रत्येक समुदाय के लिए उनके कर्म को सुशोभित कर दिया है। फिर उनके पालनहार ही की ओर उनका लौटना है, तो वह उन्हें बताएगा, जो कुछ वे किया करते थे।”
“धर्म के मामले में कोई ज़ोर-ज़बरदस्ती नहीं। निःसंदेह सन्मार्ग, पथभ्रष्टता से स्पष्ट हो चुका है। अतः जो कोई ताग़ूत (अल्लाह के सिवा अन्य पूज्यों) का इनकार करे और अल्लाह पर ईमान लाए, तो निश्चय उसने मज़बूत कड़े को थाम लिया, जिसे किसी भी तरह टूटना नहीं। तथा अल्लाह सब कुछ सुनने वाला, सब कुछ जानने वाला है।”
“आप कह दें : यह सत्य तुम्हारे पालनहार की ओर से है। अब जो चाहे, ईमान लाए और जो चाहे कुफ़्र करे। निःसंदेह हमने अत्याचारियों के लिए ऐसी आग तैयार कर रखी है, जिसकी दीवारें उन्हें घेर लेंगी। और यदि वे फ़र्याद करेंगे, तो उन्हें ऐसा जल दिया जाएगा, जो तेल की तलछट जैसा होगा, जो चेहरों को भून डालेगा। वह क्या ही बुरा पेय है और वह क्या ही बुरा विश्राम स्थान है!”
पैगंबर (ﷺ) ने अपने आलोचकों को सहा
जब पैगंबर (ﷺ) संपत्ति बाँट रहे थे, तो एक आदमी ने उनके मुँह पर उनसे न्याय करने को कहा। उनके साथी उमर ने उसे मार डालने की अनुमति माँगी। पैगंबर (ﷺ) ने कहा, “उसे छोड़ दो।” एक और आदमी ने कहा कि पैगंबर (ﷺ) का ग़नीमत का बँटवारा न्यायपूर्ण नहीं था। उन्होंने उत्तर दिया कि मूसा को इससे भी अधिक तकलीफ़ दी गई थी और उन्होंने धैर्य रखा। एक क़र्ज़ देने वाले ने कठोरता से बात की, तो उसका बचाव किया गया, क्योंकि जिसका हक़ बनता है “उसे बोलने का अधिकार है”। उस क़र्ज़ देने वाले को एक बेहतर ऊँट से चुकाया गया। एक बद्दू ने उनकी चादर ज़ोर से खींची, तो उसे एक मुस्कान और एक उपहार मिला। कुछ यहूदियों ने उन्हें “तुम पर मौत हो” कहकर अभिवादन किया। उन्होंने केवल “और तुम पर भी” कहकर उत्तर दिया, और अपनी पत्नी आयशा से नरमी बरतने को कहा।
अबू सईद ख़ुदरी बताते हैं कि जब पैगंबर (ﷺ) संपत्ति बाँट रहे थे, तो एक आदमी ने उनसे कहा, “न्याय करो।” उमर ने उसकी गर्दन उड़ाने की अनुमति माँगी, और पैगंबर ने कहा, “उसे छोड़ दो।”
अब्दुल्लाह बिन मसऊद बताते हैं कि हुनैन के बाद, जब पैगंबर (ﷺ) ने कुछ प्रमुख अरबों को ग़नीमत में बड़ा हिस्सा दिया, तो एक आदमी ने कहा कि यह बँटवारा न्यायपूर्ण नहीं है और अल्लाह के लिए नहीं किया गया। जब उन्हें यह बताया गया, तो पैगंबर ने कहा: अगर अल्लाह और उसके रसूल न्याय नहीं करेंगे तो कौन करेगा? अल्लाह मूसा पर दया करे; उन्हें इससे भी अधिक तकलीफ़ दी गई, और उन्होंने धैर्य रखा।
अबू हुरैरा बताते हैं कि एक आदमी पैगंबर (ﷺ) से क़र्ज़ माँगने आया और कठोरता से बोला। सहाबा उसकी ओर बढ़े, लेकिन पैगंबर ने कहा: उसे छोड़ दो, क्योंकि जिसका हक़ बनता है उसे बोलने का अधिकार है। उन्होंने उस आदमी को देय ऊँट से अधिक उम्र का, बेहतर ऊँट दिलवाया, और कहा कि सबसे अच्छे लोग वे हैं जो सबसे अच्छी तरह चुकाते हैं।
अनस बताते हैं कि एक बद्दू ने पैगंबर (ﷺ) की चादर इतनी ज़ोर से खींची कि उसके किनारे ने उनके कंधे पर निशान छोड़ दिया, और माँग की कि अल्लाह ने जो धन उन्हें दिया है उसमें से उसे भी कुछ दिया जाए। पैगंबर उसकी ओर मुड़े, मुस्कुराए, और आदेश दिया कि उसे एक उपहार दिया जाए।
आयशा बताती हैं कि कुछ यहूदियों ने पैगंबर (ﷺ) को “तुम पर मौत हो” कहकर अभिवादन किया, और उन्होंने बदले में उन्हें कोसा। उन्होंने उनसे कहा कि नरमी बरतो, क्योंकि अल्लाह हर मामले में नरमी को पसंद करता है। जब उन्होंने पूछा कि क्या उन्होंने नहीं सुना कि उन लोगों ने क्या कहा, तो उन्होंने उत्तर दिया कि उन्होंने उन्हें केवल “और तुम पर भी” कहकर उत्तर दिया था।
काब बिन अशरफ़
आलोचक काब बिन अशरफ़ की ओर इशारा करते हैं, जिसे मारने का आदेश पैगंबर (ﷺ) ने दिया। काब को असहमति के लिए नहीं मारा गया। वह मदीना का एक प्रमुख व्यक्ति था। मक्का का प्रमुख क़बीला क़ुरैश मुसलमानों से युद्ध में था। बद्र की लड़ाई के बाद, काब मक्का गया। उसने अपनी कविताओं में उनके मृतकों का शोक मनाया और उन्हें फिर से पैगंबर (ﷺ) से लड़ने के लिए उकसाया। यह अपने ही नगर के विरुद्ध युद्ध का आह्वान था, कोई राय नहीं। अबू राफ़े को बाद के एक आदेश पर मारा गया। बुख़ारी की रिवायत उसे ऐसा आदमी बताती है जो पैगंबर (ﷺ) के विरुद्ध उनके शत्रुओं की मदद करता था। दोनों आदेश पैगंबर (ﷺ) की ओर से, मदीना के राज्य-प्रमुख और न्यायाधीश के रूप में, युद्ध के समय में आए। कोई निजी व्यक्ति उनकी नक़ल नहीं कर सकता।
जाबिर बिन अब्दुल्लाह बताते हैं कि पैगंबर (ﷺ) ने पूछा कि काब बिन अशरफ़ से कौन निपटेगा, जिसने अल्लाह और उसके रसूल को कष्ट पहुँचाया था, और मुहम्मद बिन मसलमा ने स्वयं को प्रस्तुत किया।
बताते हैं कि बद्र में मुसलमानों की जीत के बाद मदीना का एक प्रमुख व्यक्ति काब बिन अशरफ़ मक्का गया, अपनी कविताओं में क़ुरैश के मृतकों का शोक मनाया और क़ुरैश को फिर से पैगंबर (ﷺ) से लड़ने के लिए उकसाया। मदीना लौटने के बाद पैगंबर ने पूछा कि उससे कौन निपटेगा।
बरा बिन आज़िब बताते हैं कि पैगंबर (ﷺ) ने अब्दुल्लाह बिन अतीक के नेतृत्व में अंसार का एक दल अबू राफ़े के विरुद्ध भेजा, जो पैगंबर को तकलीफ़ पहुँचाता था और उनके विरुद्ध उनके शत्रुओं की मदद करता था, और जो हिजाज़ में एक क़िले में रहता था।
सत्ता के सामने सच बोलना
इस्लाम अपने लोगों से शासकों की चापलूसी करने को नहीं कहता। सहाबा ने पैगंबर (ﷺ) से प्रतिज्ञा की कि वे सुनेंगे और मानेंगे। उसी प्रतिज्ञा में उन्होंने वादा किया कि वे जहाँ भी हों सच बोलेंगे, किसी की निंदा से नहीं डरेंगे। इस्लाम में आज्ञापालन का अर्थ चुप रहना नहीं है।
उबादा बिन सामित बताते हैं कि सहाबा ने पैगंबर (ﷺ) से बैअत (प्रतिज्ञा) की कि वे सुनेंगे और मानेंगे, सत्ताधारियों से सत्ता के लिए झगड़ा नहीं करेंगे, और जहाँ भी हों सच बोलेंगे, अल्लाह के लिए किसी की निंदा से नहीं डरेंगे।
ईश्वर (﷾) की तय की हुई सीमाएँ
इस्लाम झूठ से मना करता है। पैगंबर (ﷺ) ने कहा कि झूठ बुराई और आग की ओर ले जाता है। एक मुसलमान को कोई ख़बर आगे बढ़ाने से पहले उसकी जाँच करनी चाहिए। किसी पाकदामन स्त्री पर चार गवाहों के बिना व्यभिचार का आरोप लगाने पर, क़ुरआन अस्सी कोड़ों की सज़ा तय करता है, जिसे किसी वैध अदालत को लागू करना है, और आरोप लगाने वाले की गवाही अस्वीकार कर दी जाती है। फ़िक़्ह के मज़हब, यानी इस्लामी क़ानून की मुख्य परंपराएँ, इस पर अलग राय रखते हैं कि अगर वह तौबा कर ले तो क्या उसकी गवाही बहाल हो जाती है। इस्लाम आधुनिक क़ानून से आगे जाता है, क्योंकि वह ग़ीबत से मना करता है। यानी किसी के बारे में ऐसी सच्ची बात कहना जो उसे नापसंद हो। क़ुरआन इसकी तुलना मरे हुए भाई का मांस खाने से करता है। उस आयत की अरबी ग़ीबत का साफ़ नाम लेती है (ला यग़्तब)। इन सब पर नियम यह है कि भली बात कहो या चुप रहो। शास्त्रीय इस्लामी क़ानून पैगंबर (ﷺ) के अपमान को सबसे गंभीर अपराधों में गिनता है, और अधिकतर शास्त्रीय फ़क़ीहों (इस्लामी क़ानून के विद्वानों) ने इसकी सज़ा मौत रखी। वह खुले तौर पर इस्लाम छोड़ने के लिए भी एक सज़ा तय करता है, जो एक अलग प्रश्न है। मुसलमान विद्वान मानते हैं कि कोई भी सज़ा किसी मुस्लिम राज्य की वैध अदालत का काम है, मुक़दमे के बाद। वे मानते हैं कि कोई व्यक्ति इसे अपने ऊपर नहीं ले सकता। मुसलमान जहाँ भी रहे, वह उस देश के क़ानून का पालन करता है (17:34), और अपमान का उत्तर धैर्य से देता है (3:186)।
अब्दुल्लाह बिन मसऊद बताते हैं कि पैगंबर (ﷺ) ने कहा कि सच्चाई नेकी की ओर ले जाती है और नेकी जन्नत की ओर, और आदमी सच बोलता रहता है यहाँ तक कि वह सच्चा बन जाता है। झूठ बुराई की ओर ले जाता है और बुराई आग की ओर, और आदमी झूठ बोलता रहता है यहाँ तक कि अल्लाह के यहाँ झूठा लिख दिया जाता है।
“ऐ ईमान वालो! यदि कोई दुराचारी (अवज्ञाकारी) तुम्हारे पास कोई सूचना लेकर आए, तो उसकी अच्छी तरह जाँच-पड़ताल कर लिया करो। ऐसा न हो कि तुम किसी समुदाय को अज्ञानता के कारण हानि पहुँचा दो, फिर अपने किए पर पछताओ।”
“तथा जो लोग सच्चरित्रा स्त्रियों पर व्यभिचार का आरोप लगाएँ, फिर चार गवाह न लाएँ, तो उन्हें अस्सी कोड़े मारो और उनकी कोई गवाही कभी स्वीकार न करो और वही अवज्ञाकारी लोग हैं।”
“जब तुम इसे एक-दूसरे से अपनी ज़बानों के साथ ले रहे थे और अपने मुँहों से वह बात कह रहे थे, जिसका तुम्हें कोई ज्ञान नहीं तथा तुम इसे साधारण समझते थे, हालाँकि वह अल्लाह के निकट बहुत बड़ी थी।”
अबू हुरैरा बताते हैं कि पैगंबर (ﷺ) ने अपने सहाबा से पूछा कि ग़ीबत (पीठ पीछे बुराई) क्या है, और उन्हें बताया कि यह अपने भाई के बारे में वह कहना है जो उसे नापसंद हो। पूछा गया कि अगर वह दोष सचमुच उसमें हो तो, उन्होंने कहा: अगर वह उसमें है, तो तुमने उसकी ग़ीबत की; और अगर नहीं है, तो तुमने उस पर झूठा आरोप लगाया।
“ऐ लोगो जो ईमान लाए हो! बहुत-से गुमानों से बचो। निश्चय ही कुछ गुमान पाप हैं। और जासूसी न करो, और न तुममें से कोई दूसरे की ग़ीबत करे। क्या तुममें से कोई पसंद करता है कि अपने भाई का मांस खाए, जबकि वह मरा हुआ हो? सो तुम उसे नापसंद करते हो।”
अबू हुरैरा बताते हैं कि पैगंबर (ﷺ) ने कहा कि जो अल्लाह और अंतिम दिन पर ईमान रखता है, वह अपने पड़ोसी को तकलीफ़ न दे, अपने मेहमान का आदर करे, और भली बात कहे या चुप रहे।
1294 ई. में लिखा गया एक शास्त्रीय ग्रंथ, उस व्यक्ति के हुक्म पर जो पैगंबर (ﷺ) का अपमान करे। यह इब्न अल-मुंज़िर का यह कथन बताता है कि आम तौर पर विद्वान मानते हैं कि ऐसे व्यक्ति को मार दिया जाए, और उस हुक्म के लिए प्रमाण प्रस्तुत करता है।
“और अनाथ के धन के निकट न जाओ, परन्तु उस तरीक़े से जो सबसे उत्तम हो, यहाँ तक कि वह अपनी युवावस्था को पहुँच जाए। तथा प्रतिज्ञा पूरा करो। निःसंदेह प्रतिज्ञा के विषय में प्रश्न किया जाएगा।”
“(ऐ ईमान वालो!) तुम अपने धनों और प्राणों के बारे में ज़रूर परीक्षा में डाले जाओगे और तुम अवश्य ही उन लोगों से जो तुमसे पहले किताब दिए गए थे तथा उन लोगों से जो शिर्क में पड़े हुए हैं, बहुत-सी दुःखद बातें सुनोगे। लेकिन यदि तुम धैर्य से काम लो और (अल्लाह से) डरते रहो, तो यह बड़े साहस का काम है।”
हर समाज बोलने पर सीमाएँ लगाता है
इंग्लैंड में किसी आदमी पर मानहानि का मुक़दमा किया जा सकता है। शपथ के तहत झूठ बोलना झूठी गवाही का अपराध है। नस्लीय घृणा भड़काने के इरादे से धमकी भरे, गाली-भरे या अपमानजनक शब्द एक अपराध हैं। 1977 में अख़बार गे न्यूज़ के संपादक को मसीह के बारे में एक कविता के लिए ईशनिंदात्मक मानहानि का दोषी ठहराया गया। 1979 में हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स ने उस सज़ा को बरक़रार रखा। 2006 में संसद ने धार्मिक घृणा भड़काने के नए अपराध जोड़े, और 2008 में उसने ईशनिंदा को समाप्त कर दिया। रेखाएँ खींची गईं, फिर खिसका दी गईं।
न्यायिक कार्यवाही में विधिवत शपथ लिए गवाह के लिए जानबूझकर कोई ऐसा महत्वपूर्ण कथन देना अपराध बनाता है जिसे वह झूठा जानता हो या सच न मानता हो।
नस्लीय घृणा भड़काने के इरादे से, या जहाँ नस्लीय घृणा भड़कने की संभावना हो, धमकी भरे, अपमानजनक या अपमानसूचक शब्दों या व्यवहार का प्रयोग करना, या ऐसी लिखित सामग्री दिखाना अपराध बनाता है।
हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स ने दो के मुक़ाबले तीन मतों से गे न्यूज़ के संपादक डेनिस लेमन की 1977 की उस सज़ा को बरक़रार रखा जो मसीह के बारे में एक कविता पर ईशनिंदात्मक मानहानि के लिए दी गई थी। यह मामला मैरी व्हाइटहाउस द्वारा लाया गया एक निजी अभियोजन था।
इंग्लैंड और वेल्स में ईशनिंदा और ईशनिंदात्मक मानहानि के कॉमन-लॉ अपराधों को समाप्त किया।
धमकी भरे शब्दों या व्यवहार से धार्मिक घृणा भड़काने के नए अपराध जोड़े, जिन्हें सार्वजनिक व्यवस्था अधिनियम 1986 के भाग 3A के रूप में डाला गया।
दृष्टिकोण
अंग्रेज़ी क़ानून
अंग्रेज़ी क़ानून ने हमेशा बोलने पर सीमाएँ लगाई हैं। रेखाएँ खिसकी हैं: 1977 में ईशनिंदा पर सज़ा दी गई और 2008 में उसे समाप्त कर दिया गया, जबकि घृणा भड़काने के नए अपराध जोड़े गए।
हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स ने 1979 में ईशनिंदात्मक मानहानि की एक सज़ा को बरक़रार रखा।
संसद ने 2008 में इंग्लैंड और वेल्स में ईशनिंदा और ईशनिंदात्मक मानहानि के अपराधों को समाप्त कर दिया।
इंग्लैंड में झूठी गवाही, और नस्लीय या धार्मिक घृणा भड़काने के इरादे से कहे गए शब्द अपराध हैं।
इस्लामी दृष्टिकोण
इस्लाम असहमत होने, आलोचना करने और वाद-विवाद करने की स्वतंत्रता देता है। पैगंबर (ﷺ) ने कठोर और अन्यायपूर्ण शब्द धैर्य से सहे। इस्लाम झूठ, बदनामी, ग़ीबत और अपमान से मना करता है, सबसे बढ़कर ईश्वर (﷾) और उसके नबियों के अपमान से। शास्त्रीय क़ानून ने बदनामी और पैगंबर (ﷺ) के अपमान के लिए सज़ाएँ तय कीं। मुसलमान विद्वान मानते हैं कि केवल एक वैध अदालत उन्हें लागू कर सकती है, कभी कोई व्यक्ति अपने बल पर नहीं, और मुसलमान जिस भी देश में रहे उसके क़ानून का पालन करता है। ईश्वर (﷾) ने झूठ, बदनामी और अपमान से मना किया, और वह नैतिक नियम चौदह शताब्दियों में नहीं खिसका।
क़ुरआन अपने ख़िलाफ़ अपने विरोधियों के आरोप दर्ज करता है और तर्क से उनका उत्तर देता है।
क़ुरआन सबसे अच्छे ढंग से वाद-विवाद करने का आदेश देता है, दूसरों के पूज्यों को बुरा कहने से मना करता है, और धर्म में ज़बरदस्ती से मना करता है।
पैगंबर (ﷺ) ने उन लोगों को बिना नुक़सान पहुँचाए जाने दिया जिन्होंने उन पर अन्याय का आरोप लगाया या उनसे कठोर व्यवहार किया।
काब बिन अशरफ़ ने क़ुरैश को फिर से मदीना से लड़ने के लिए उकसाया। फिर उसे राज्य-प्रमुख के आदेश पर, युद्ध के समय में, मारा गया।
सहाबा ने आज्ञापालन की प्रतिज्ञा की। उसी प्रतिज्ञा में उन्होंने वादा किया कि वे जहाँ भी हों सच बोलेंगे, किसी की निंदा से नहीं डरेंगे।
इस्लाम झूठ, बदनामी और ग़ीबत से मना करता है, और भली बात कहने या चुप रहने का आदेश देता है।
वह्य से तय सीमाएँ अपनी जगह रहती हैं, जबकि क़ानून और राय से तय सीमाएँ खिसकती रहती हैं।