संक्षिप्त उत्तर

नहीं। इस्लाम में हर व्यक्ति सीधे ईश्वर (﷾) की ओर रुख़ करता है, बिना किसी पुरोहित, संत या बिचौलिए के। क़ुरआन कहता है कि ईश्वर (﷾) क़रीब है और हर उस व्यक्ति को जवाब देता है जो उसे पुकारता है। वह कहता है कि ईश्वर (﷾) इंसान से उसकी गले की नस, यानी गर्दन की बड़ी नस, से भी ज़्यादा क़रीब है। जो मुसलमान पाप करता है, वह केवल ईश्वर (﷾) के सामने उसे स्वीकार करता है, पछताता है, और उसकी ओर लौटता है। तौबा का दरवाज़ा मौत तक खुला रहता है। पैगंबर (ﷺ) ने सिखाया कि ईश्वर (﷾) को पुकारना अपने आप में इबादत है, इसलिए यह केवल ईश्वर (﷾) का हक़ है। उन्होंने अपनी बेटी, फ़ातिमा, से भी कहा कि वे अल्लाह (﷾) के मुक़ाबले उनकी कुछ भी मदद नहीं कर सकते। इमाम नमाज़ पढ़ाता है और शिक्षा देता है, पर वह न किसी का पाप-स्वीकार सुनता है और न क्षमा देता है। इस्लाम का जवाब यह है कि ईश्वर (﷾) स्वयं क्षमा करता है।

पूरी व्याख्या पढ़ें

अपने सहेजे गए पृष्ठ देखें