संक्षिप्त उत्तर

हाँ। ईश्वर (﷾) की किताबों पर ईमान मुसलमान के ईमान का हिस्सा है। क़ुरआन कहता है कि ईश्वर (﷾) ने मूसा को तौरात, दाऊद को ज़बूर और ईसा को इंजील (वह सुसमाचार जिसका ईसा ने प्रचार किया) दी। वह तौरात और इंजील को मार्गदर्शन और प्रकाश कहता है। जो मुसलमान इनकार करे कि ईश्वर (﷾) ने इन्हें उतारा, वह मुसलमान नहीं है। पर इन नामों का अर्थ वह है जो ईश्वर (﷾) ने उन पैगंबरों को दिया, न कि वे किताबें जो आज ये नाम रखती हैं। छपी हुई तौरात मूसा की मृत्यु और दफ़न को दर्ज करती है। नए नियम के चारों सुसमाचार ईसा के दशकों बाद लिखे गए, हर एक किसी लेखक ‘के अनुसार’। जो क़ुरआन उतारी गई किताबों की प्रशंसा करता है, वही उनकी निंदा भी करता है जिन्होंने अपने हाथों से किताब लिखी। इसलिए एक मुसलमान बाइबिल का उस वह्य के लिए आदर करता है जो अब भी उसमें है। जिसकी क़ुरआन पुष्टि करता है उसे वह रखता है, और जो उसका खंडन करता है उसे अलग रखता है। क़ुरआन सबसे अंत में आया, इसलिए अंतिम फ़ैसला उसी का है।

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