संक्षिप्त उत्तर

नहीं। पैगंबर मुहम्मद (ﷺ) का जीवन इस बात को ख़ारिज कर देता है। प्रचार शुरू करते ही उन्हें वर्षों का अपमान, बहिष्कार, देश-निकाला और युद्ध झेलना पड़ा। उनकी सबसे पुरानी जीवनी दर्ज करती है कि मक्का के सरदारों ने उन्हें पेशकश की कि अगर वे रुक जाएँ तो उन्हें धन, सरदारी और राजसत्ता मिलेगी। उन्होंने इनकार कर दिया। अरब के ज़्यादातर हिस्से के शासक होकर भी वे खजूर के पत्तों की चटाई पर सोते थे। जब उनकी मृत्यु हुई, तो उनका कवच जौ के बदले एक यहूदी आदमी के पास गिरवी था, और उनके परिवार को विरासत में कुछ नहीं मिला। उनकी पत्नियों को एक तोहफ़े के साथ तलाक़ की पेशकश की गई, और सबने उनके साथ ग़रीबी चुनी। पच्चीस वर्षों तक उनकी एक ही पत्नी थीं, ख़दीजा, जो उनसे उम्र में बड़ी थीं। जब उन्होंने बैठकर नमाज़ पढ़ाई, तो अपने अनुयायियों से कहा कि खड़े न रहें, जैसे प्रजा राजाओं के सामने खड़ी रहती है। सत्ता चाहने वाला आदमी ऐसे नहीं जीता। इस्लाम का जवाब है कि वे ईश्वर (﷾) के एक सच्चे रसूल थे।

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