संक्षिप्त उत्तर

चोट इस बात की है कि मज़ाक़ किसका उड़ाया जा रहा है, हास्य की नहीं। पैगंबर (ﷺ) ख़ुद मज़ाक़ करते थे। वे एक छोटे बच्चे को छेड़ने के लिए पूछा करते थे, “ऐ अबू उमैर, छोटी चिड़िया ने क्या किया?” पर इस्लाम एक मुसलमान से कहता है कि वह पैगंबर (ﷺ) से अपने पिता, अपनी संतान और सब लोगों से अधिक प्रेम करे। इसलिए उनका मज़ाक़ उड़ाने वाला कार्टून किसी आदमी की माँ के अपमान जैसा लगता है। एक मुसलमान ईसा, मूसा या इब्राहीम का भी मज़ाक़ नहीं उड़ा सकता, क्योंकि वे भी इस्लाम के नबी हैं। 1979 में बहुत-से ईसाइयों ने फ़िल्म ‘लाइफ़ ऑफ़ ब्रायन’ के विरुद्ध इसी तरह विरोध किया था। क़ुरआन मुसलमानों से कहता है कि मज़ाक़ उड़ाने वालों से बदला न लें। उन्हें वहाँ से हट जाना है और जाहिलों को “सलाम है” कहकर जवाब देना है। शास्त्रीय इस्लामी क़ानून ने कोई भी सज़ा केवल एक मुस्लिम राज्य की वैध अदालत को सौंपी। कोई व्यक्ति इसके लिए किसी को सज़ा नहीं दे सकता, और मुसलमान जिस भी देश में रहते हैं उसके क़ानून का पालन करते हैं (17:34)।

पूरी व्याख्या पढ़ें

अपने सहेजे गए पृष्ठ देखें