संक्षिप्त उत्तर

नास्तिकता के अनुसार, अपनी तर्क-शक्ति पर भरोसा करने का कोई अच्छा कारण नहीं है। तब मन केवल एक अंधी, बिना मार्गदर्शन वाली प्रक्रिया से आया होगा, जिसने वही रखा जिससे हमारे पूर्वजों को जीवित रहने में मदद मिली। पर जीवित रहना और सही होना एक ही बात नहीं है। फिर भी नास्तिक को इसी मन से यह निष्कर्ष निकालना पड़ता है कि कोई ईश्वर (﷾) नहीं है। यह मत उस औज़ार पर भरोसा करने का कोई कारण नहीं देता जिससे वह निष्कर्ष निकाला गया। स्वयं चार्ल्स डार्विन ने 1881 में संदेह किया कि जानवरों के मन से विकसित हुए मन के विश्वासों पर ज़रा भी भरोसा किया जा सकता है या नहीं। यह संदेह हर विश्वास तक पहुँचता है, नास्तिकता तक भी। ईमान वाले के सामने ऐसी कोई समस्या नहीं है। क़ुरआन कहता है कि ईश्वर (﷾) ने लोगों को सुनने, देखने और समझने की शक्ति दी, और वह उन्हें इनका उपयोग करने को कहता है। जो मन उसी ने दिया जिसने वह संसार बनाया जिसका यह मन अध्ययन करता है, वह मन भरोसे के लायक़ है।

पूरी व्याख्या पढ़ें

अपने सहेजे गए पृष्ठ देखें