संक्षिप्त उत्तर

नहीं। ज़रूरत में अल्लाह (﷾) को पुकारना इबादत है, और इबादत केवल अल्लाह (﷾) के लिए है। क़ुरआन में अल्लाह (﷾) कहता है: “तुम मुझे पुकारो। मैं तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार करूँगा।” पैगंबर (ﷺ) ने सिखाया कि दुआ इबादत है। वे अपने पालनहार को ख़ुद पुकारते थे, और अल्लाह (﷾) ने उनसे कहलवाया कि वे किसी को न हानि पहुँचा सकते हैं, न सही राह पर ला सकते हैं। अली ने बताया कि पैगंबर (ﷺ) कैसे नमाज़ पढ़ते थे, और सही रिवायतों में उनसे आगे पहुँचाई गई दुआएँ केवल अल्लाह (﷾) को पुकारती हैं। अली और पैगंबर (ﷺ) का परिवार अल्लाह (﷾) और उसके रसूल (ﷺ) से प्रेम करते थे, और इसी कारण हम उनसे प्रेम करते हैं। किसी जीवित व्यक्ति से अपने लिए दुआ करने को कहना, या जो वह कर सकता है उसमें मदद माँगना, ठीक है। मुर्दों या अनुपस्थित लोगों को उस चीज़ के लिए पुकारना जो केवल अल्लाह (﷾) दे सकता है, ठीक नहीं। सिफ़ारिश सच है, और वह केवल अल्लाह (﷾) के देने से मिलती है।

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