संक्षिप्त उत्तर

नहीं। मुसलमान केवल ईश्वर (﷾) की इबादत करते हैं। उसके साथ किसी और की, यहाँ तक कि पैगंबर मुहम्मद (ﷺ) की भी, इबादत करना इस्लाम में सबसे बड़ा पाप है। क़ुरआन उनसे कहलवाता है कि उनके पास अपने लिए भी कोई लाभ या हानि पहुँचाने की शक्ति नहीं है। उन्होंने अपने अनुयायियों से कहा कि उनकी हद से ज़्यादा प्रशंसा न करें जैसे ईसाइयों ने ईसा की की। उन्होंने कहा कि उन्हें अल्लाह (﷾) का बंदा और उसका रसूल कहा जाए। जब उनकी मृत्यु हुई, तो उनके सबसे क़रीबी मित्र अबू बक्र ने शोक में डूबी भीड़ से कहा कि जो मुहम्मद (ﷺ) की इबादत करता था, वह जान ले कि वे मर चुके हैं। जो अल्लाह (﷾) की इबादत करता था, वह जान ले कि अल्लाह (﷾) जीवित है और कभी नहीं मरता। पुराना नाम ‘मुहम्मडन’ ‘क्रिश्चियन’ (ईसाई) के ढर्रे पर गढ़ा गया था, मानो मुसलमान उनके साथ वैसा व्यवहार करते हों जैसा ईसाई यीशु के साथ करते हैं। मुसलमान उनसे प्रेम करते हैं और उनके उदाहरण पर चलते हैं, पर दुआ केवल ईश्वर (﷾) से करते हैं।

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