संक्षिप्त उत्तर

नहीं। पहली शताब्दी के एक ईसाई प्रचारक पौलुस अपने कुछ शब्दों को अपना बताते हैं, प्रभु का नहीं। एक ही अध्याय में वे एक फ़ैसला देते हैं और कहते हैं कि यह प्रभु की ओर से है। कुछ पंक्तियों बाद वे दूसरा फ़ैसला देते हैं और कहते हैं, “प्रभु नहीं, परन्तु मैं ही कहता हूँ”। तीसरे प्रश्न के बारे में वे लिखते हैं कि उन्हें प्रभु की कोई आज्ञा नहीं मिली। उस फ़ैसले को वे अपनी ‘सम्मति’ कहते हैं। वे कहते हैं कि यह “अनुमति है, न कि आज्ञा”। जो लेखक अपने कुछ शब्दों को अपना बताए, उसके हर शब्द को ईश्वर (﷾) का नहीं गिना जा सकता। फिर भी कलीसिया ने यह सब बाइबिल में रख दिया। इस्लाम यह रेखा साफ़ रखता है। क़ुरआन में केवल ईश्वर (﷾) का वचन है। पैगंबर (ﷺ) के शब्द उससे अलग रखे गए हैं।

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