संक्षिप्त उत्तर

आयशा के अपने बयान के अनुसार, निकाह का अनुबंध तब हुआ जब वे छह वर्ष की थीं। नौ वर्ष की उम्र में वे पैगंबर (ﷺ) के घर आईं। उनकी दुनिया में लड़की को बालिग़ होने पर विवाह के लिए तैयार माना जाता था। उसके बाद एक हज़ार वर्ष तक ईसाई यूरोप का क़ानून लड़की की सगाई सात वर्ष पर और शादी बारह वर्ष पर होने देता था। अंग्रेज़ी क़ानून 1929 तक बारह वर्ष की लड़की को शादी करने देता था। बाइबिल कोई न्यूनतम आयु तय नहीं करती। सातवीं शताब्दी के अरब के किसी विवाह को परखने के लिए तीन प्रश्न मायने रखते हैं: क्या वे तैयार थीं, क्या उन्हें कोई नुक़सान हुआ, और क्या उन्होंने इसे ख़ुद चुना? पारंपरिक इस्लामी क़ानून ने तब तक दांपत्य जीवन को मना किया जब तक पत्नी शारीरिक रूप से तैयार न हो। कोई आरंभिक रिवायत उन्हें हुए किसी नुक़सान को दर्ज नहीं करती। वर्षों बाद, जब उन्हें आज़ादी की पेशकश की गई, आयशा ने रहना चुना। वे आरंभिक इस्लाम की सबसे बड़ी विद्वानों में से एक बनीं। उनके किसी शत्रु का इस विवाह पर आपत्ति करना दर्ज नहीं है। इस्लाम का उत्तर इन्हीं प्रश्नों पर टिका है, और रिकॉर्ड उनका उत्तर देता है। आज हर देश का क़ानून विवाह की आयु तय करता है, और मुसलमान जहाँ भी रहें क़ानून का पालन करते हैं, क्योंकि क़ुरआन उन्हें उनके समझौतों से बाँधता है (17:34)।

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