संक्षिप्त उत्तर

इस्लाम ईश्वर (﷾) को याद करने पर ज़ोर देता है क्योंकि पाप आम तौर पर तब आता है जब ईश्वर (﷾) को भुला दिया जाता है। जब तक कोई व्यक्ति ईश्वर (﷾) को मन में रखता है, ग़लत काम कठिन होता है। शैतान मन को दूसरी चीज़ों से भरने में लगा रहता है ताकि ईश्वर (﷾) भुला दिया जाए। इसलिए इबादत के काम ईश्वर (﷾) को मन में रखने के लिए बनाए गए हैं। पाँच दैनिक नमाज़ें दिन भर में, भोजन, काम और नींद के बीच फैली हैं, और क़ुरआन कहता है कि नमाज़ ईश्वर (﷾) की याद के लिए है। रोज़ा आत्म-संयम सिखाता है। शराब और जुआ आंशिक रूप से इसलिए हराम हैं कि वे याद में रुकावट डालते हैं। जब कोई ईमान वाला पाप कर बैठता है, तो ईश्वर (﷾) की याद उसे क्षमा माँगने के लिए वापस लाती है। इस्लाम ज़्यादातर चीज़ों में संतुलन माँगता है, लेकिन ईश्वर (﷾) की याद बहुतायत से माँगता है। क़ुरआन एक वादा जोड़ता है: ईश्वर (﷾) की याद से दिलों को संतुष्टि मिलती है।

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