संक्षिप्त उत्तर

हाँ, एक मोमिन के लिए। पैगंबर (ﷺ) ने थकान, बीमारी, चिंता, ग़म और चोट का नाम लिया, यहाँ तक कि काँटा चुभने का भी। इनमें से कोई भी चीज़ किसी मुसलमान को नहीं पहुँचती, मगर अल्लाह (﷾) उसके ज़रिए उसके कुछ पाप मिटा देता है। पाप उससे ऐसे झड़ते हैं जैसे पेड़ से पत्ते झड़ते हैं। तकलीफ़ इस बात की निशानी नहीं है कि अल्लाह (﷾) आपसे नाराज़ है। पैगंबरों ने सबसे ज़्यादा तकलीफ़ उठाई। यह बात हर तरह की मुश्किल पर लागू होती है। इसमें बीमारी और दर्द, उदासी और बेचैनी, ग़रीबी और क़र्ज़ आते हैं। इसमें किसी प्रियजन को खोना, और किसी के हाथों ज़ुल्म सहना भी आता है। जो बच्चा छोटी उम्र में मर जाता है, वह जन्नत में जाता है। सब्र से ऐसा बदला मिलता है जिसकी कोई गिनती नहीं। लेकिन तकलीफ़ तौबा की जगह नहीं लेती, और न ही वह उसे चुकाती है जो आप पर दूसरे लोगों का बाक़ी है। इस्लाम आपसे यह भी नहीं कहता कि आप तकलीफ़ ढूँढ़ें। पैगंबर (ﷺ) ने बीमारों से इलाज ढूँढ़ने को कहा, और उन्होंने अल्लाह (﷾) से चिंता, ग़म और क़र्ज़ से बचाव माँगा।

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