संक्षिप्त उत्तर

इस्लाम जान, माल और इज़्ज़त की रक्षा करता है, और हर किसी के लिए न्याय का आदेश देता है। पैगंबर (ﷺ) ने ईमान वालों से कहा कि उनका ख़ून, उनका माल और उनकी इज़्ज़त पवित्र है। उन्होंने चेताया कि जो कोई संधि के तहत रहने वाले किसी ग़ैर-मुसलमान को मार डाले, वह जन्नत की ख़ुशबू नहीं सूँघेगा। क़ुरआन ईश्वर (﷾) का यह आदेश दर्ज करता है कि एक निर्दोष जान लेना सारे इंसानों की हत्या जैसा है, और एक जान बचाना सारे इंसानों को बचाने जैसा। इज़्ज़त की भी रक्षा होती है, इसलिए दूसरों का मज़ाक़ उड़ाना और उनका अपमान करना हराम है। कोई नस्ल दूसरी से ऊपर नहीं; ईश्वर (﷾) के यहाँ केवल नेकी गिनी जाती है। मुसलमानों को न्याय से फ़ैसला करना है, अपने ख़िलाफ़ भी और उन लोगों के प्रति भी जिनसे वे नफ़रत करते हैं। पैगंबर (ﷺ) ने चेताया कि ज़ुल्म क़यामत के दिन अंधेरा होगा। और इस जीवन में छीना गया हर हक़ उस दिन लौटाया जाएगा, एक सताई गई भेड़ तक का।

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