संक्षिप्त उत्तर

हाँ। क़ुरआन और एक सहीह हदीस, यानी पैगंबर (ﷺ) से आई एक रिवायत, सिखाते हैं कि उल्काएँ शैतानों को आसमान से भगाती हैं। उल्काएँ वे ज्वालाएँ हैं जिन्हें हम टूटते तारे कहते हैं। आसमान की पहरेदारी वाली कोई भी आयत यह नहीं कहती कि कोई तारा आसमान छोड़ देता है। क़ुरआन 67:5 कहती है कि ईश्वर (﷾) ने सबसे निचले आसमान को दीपों से सजाया और उन्हें मारने के अस्त्र बनाया। यूसुफ़ अली का अंग्रेज़ी अनुवाद ‘उन्हें’ को ‘such (Lamps)’ लिखता है: यानी उस तरह की रोशनियाँ। दूसरी आयतें अस्त्र का नाम लेती हैं: एक धधकती आग। उस हदीस में एक सहाबी उल्का को फेंका गया तारा कहते हैं, ठीक जैसे हिंदी में टूटता तारा कहते हैं। इब्न कसीर और क़ुरतुबी ने समझाया कि शैतानों को ज्वालाओं से मारा जाता है, तारों से नहीं। आयत जिसका वर्णन करती है, उसे कोई भी साफ़ रात में देख सकता है। उसका उद्देश्य ग़ैब से जुड़ा है, जिसे कोई दूरबीन नहीं परख सकती। इस्लाम सिखाता है कि आसमान की पहरेदारी इसलिए होती है ताकि शैतान वह्य को चोरी-छिपे न सुन सकें।

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