संक्षिप्त उत्तर

नहीं। क़ुरआन निशानियों की किताब है, विज्ञान की पाठ्यपुस्तक नहीं। वह सृष्टि की चीज़ों को निशानियाँ कहता है, और लोगों से कहता है कि उनका अध्ययन करें और ईश्वर (﷾) से और ज्ञान माँगें। पैगंबर मुहम्मद (ﷺ) ने स्वयं यह रेखा खींची। उन्होंने एक बार चलते-चलते यह राय दी कि किसानों को अपने खजूर के पेड़ों का हाथ से परागण करने की ज़रूरत नहीं, और फ़सल घट गई। उन्होंने उनसे कहा कि अपनी दुनिया के मामलों को वे बेहतर जानते हैं, पर जो वे उन्हें ईश्वर (﷾) की ओर से बताएँ उसे मानना होगा। इसलिए एक मुसलमान को किसी आयत को उस समय के सिद्धांत से नहीं बाँधना चाहिए। सिद्धांत बदलते हैं, और अगर कोई गिर जाए, तो दोष आयत पर आता है। क़ुरआन उनके साथ उठता-गिरता नहीं। उसके शब्द ठीक वैसे ही हैं जैसे वे उतारे गए थे।

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