संक्षिप्त उत्तर

नहीं। हर धर्म के लोगों ने, और किसी धर्म को न माननेवालों ने भी, किसी उद्देश्य के लिए हत्याएँ की हैं। दोनों विश्वयुद्ध इतिहास के सबसे घातक युद्ध थे, और वे देशों ने ज़मीन और सत्ता के लिए लड़े, इस्लाम के लिए नहीं। 1946 में एक यहूदी भूमिगत संगठन ने किंग डेविड होटल को बम से उड़ा दिया। अमेरिका में ईसाइयों ने गर्भपात क्लिनिकों के डॉक्टरों की हत्या की है। म्यांमार और श्रीलंका में बौद्ध राष्ट्रवादियों ने मुसलमानों पर हमले भड़काए हैं। भारत में हिंदू निगरानी समूहों ने गायों के नाम पर लोगों को मारा है। कोई भी निष्पक्ष व्यक्ति इन कामों के लिए पूरे यहूदी धर्म, ईसाई धर्म, बौद्ध धर्म या हिंदू धर्म को दोष नहीं देता। इस्लाम भी उसी निष्पक्षता का हक़दार है। इस्लाम ख़ुद अतिवाद को मना करता है। पैगंबर (ﷺ) ने चेतावनी दी कि धर्म में अति ने पहले की क़ौमों को नष्ट कर दिया। क़ुरआन कहता है कि एक बेगुनाह की हत्या सारी मानवजाति की हत्या जैसी है। और आज आतंकवाद के ज़्यादातर शिकार मुसलमान हैं। 9/11 जैसे हमलों के बाद जवाब में हुए युद्धों ने कई गुना ज़्यादा लोगों को मारा, जिनमें ज़्यादातर मुसलमान थे। उनमें से ज़्यादातर बेगुनाह नागरिक थे, जिनमें बहुत-सी औरतें और बच्चे थे। इस्लाम को उसके स्रोतों से परखिए, उसके सबसे बुरे अनुयायियों से नहीं।

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