संक्षिप्त उत्तर

इस्लाम में विवाह एक पुरुष और एक स्त्री के बीच एक सरल अनुबंध है। परिवार अक्सर रिश्ता तय करने में मदद करते हैं। लेकिन पैगंबर (ﷺ) ने आदेश दिया कि स्त्री का विवाह होने से पहले उससे पूछा जाए, और उन्होंने वह विवाह रद्द कर दिया जो एक पिता ने अपनी बेटी पर थोपा था। पति को दुल्हन को एक विवाह-उपहार देना होता है, जिसे महर कहते हैं, और वह उसी का रहता है। अनुबंध गवाहों के सामने होता है और सार्वजनिक किया जाता है, और फ़िक़्ह के अधिकतर मसलक दुल्हन के वली (संरक्षक) को भी ज़रूरी मानते हैं। विवाह के बाहर यौन संबंध मना है। ईश्वर (﷾) के सामने स्त्री और पुरुष मूल्य और प्रतिफल में बराबर हैं। क़ुरआन हर उस ईमान वाले से, पुरुष हो या स्त्री, जो अच्छा काम करे, एक ही अच्छे जीवन का वादा करता है। पति और पत्नी के एक-दूसरे पर अधिकार हैं, और दोनों के कर्तव्य हैं। क़ुरआन उनके बीच के बंधन को प्रेम और दया का बंधन कहता है।

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