संक्षिप्त उत्तर

इस्लाम बेटी को एक नेमत और एक अमानत मानता है। जिस अरब में पैगंबर (ﷺ) ने शुरुआत की, वहाँ कुछ पिता लड़की पैदा होने पर दुखी होते थे। कुछ तो नन्ही बच्चियों को ज़िंदा दफ़न कर देते थे। क़ुरआन उस दुख की निंदा करता है, उसे दफ़न करने के फ़ैसले को बुरा कहता है, और बच्चों की हत्या को मना करता है। वह कहता है कि क़यामत के दिन दफ़न की गई लड़की से पूछा जाएगा कि वह किस अपराध के कारण मारी गई। पैगंबर (ﷺ) ने कहा कि जो कोई दो लड़कियों को बड़ी होने तक अच्छी तरह पाले, वह उस दिन उनके क़रीब होगा। विधवाएँ कभी संपत्ति की तरह अपने मरे हुए पति के परिवार की विरासत बनती थीं। क़ुरआन ने इसे मना किया और विधवा को अपने पति की संपत्ति का वारिस बनाया।

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